साम्प्रदायिक साधनामें बहुदा भक्तों की प्रगति न होने से उनका साधना सम्बन्धित विश्वास डगमगाता है । ऐसा न हो, इसलिए ‘जितने व्यक्ति, उतनी प्रकृति, उतने साधना मार्ग’ यह सिद्धान्त ध्यानमें रखकर सम्प्रदायके प्रमुखोंने उसप्रकार मार्गदर्शन करना चाहिए । इस हेतु उन्हें विविध साधनामार्गोंका अभ्यास करना आवश्यक है । – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था साभार : मराठी दैनिक सनातन प्रभात (http://sanatanprabhat.org)
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