नदी-तडाग और कुंओंका आधार मिटाकर आज सम्पूर्ण भारत जलके लिए त्राहि मां कर रहा है | नगरोंके विकासकी योजना बनाते समय मात्र ५० वर्ष पश्चात इससे क्या कष्ट हो सकता है, इसका विचार न करनेवाले क्या खरे अर्थोंमें बुद्धिजीवी कहे जा सकते हैं ? यदि नगरीकरणके योजना करते समय वर्षा संचयका गम्भीरतासे विचार किया गया उसे अमल किया गया होता तो आज देशमें पेयजलकी स्थिति इतनी भयावह नहीं होती | इन बुद्धिजीवियोंसे अच्छे तो हमारे पूर्वज थे जो राजस्थान जैसे सूखाग्रस्त क्षेत्रमें भी जल संचयका इतना प्रभावी उपाय करके रखा करते थे !
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