प्रकृतिके संकेत समझकर, उसके साथ खिलवाड करनेकी प्रवृत्ति छोड, साधनारत हों !


जब हमारे श्रीगुरु एवं अन्य सन्तवृन्द आनेवाले आपातकालके विषयमें बताते थे तो कुछ निधर्मी एवं तथाकथित बुद्धिजीवी उपहास करते हुए कहते थे यह सब व्यर्थकी बातें हैं | पिछले कुछ दिनोंसे सम्पूर्ण भारतमें भिन्न राज्यों व जनपदोंके जल-प्रलयकी विनाश लीला आजकलके मुख्य समाचार होते हैं ! यह तो मात्र आरम्भिक चरण है यदि समाज शीघ्र साधना एवं धर्म उन्मुख नहीं हुआ तो आनेवाले वर्षोंमें यह विनाशलीला इतना भयावह स्वरुप धारण करेगी कि इसके विषयमें बतानेवाले भी बहुत ही कम दिखाई देंगे ! इसलिए प्रकृतिके मौनकी भाषाको संकेत समझकर, उसके साथ खिलवाड करनेकी प्रवृत्ति छोड दें और अपने भीतर कृतज्ञताका भाव अंगीकृत कर साधनारत हों ! 



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