गुरु चरणोदक


सप्तसागरपर्यन्तं तीर्थस्नानफलं तु यत् ।गुरुपादपयोबिन्दोः सहस्रांशेन तत्फलम् ।।

– श्री गुरुगीता        

अर्थ : गुरु चरणोदकको ग्रहण करनेसे जो फल प्राप्त होता है उसके सहस्रांश समान पुण्य भी सप्त सागर और तीर्थोंमें स्नान करनेसे नहीं मिलता ।

 



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