हिन्दू धर्ममें स्त्रीको गृह लक्ष्मी कहते हैं | धर्मप्रसारकी सेवाके मध्य देश-विदेशमें अनेक लोगोंके घरपर रहना हुआ है, इसी क्रममें मैंने पाया कि कुछ पुरुषोंके भाग्यमें धन मात्र उनकी पत्नीके भाग्य एवं सद्वर्तनके कारण आया; और कुछ पुरुषोंके घरमें आर्थिक संकट हेतु उनकी पत्नीके वर्तन उत्तरदायी थे, इससे यह सिद्ध हो गया कि हमारे धर्म शास्त्रोंमें स्त्रीको गृहलक्ष्मी एवं अन्नपूर्णा क्यों कहा गया है !
जिन पुरुषोंको पत्नीके भाग्य या सदवर्तनके कारण धन एवं ऐश्वर्य प्राप्त होता है, ऐसी स्त्रियोंको दैवी स्त्रियां भी कहा गया है ! ऐसी स्त्रियां स्वाभावसे विनम्र, हंसमुख, सात्त्विक, धर्माचरणी, पतिव्रता एवं त्यागी प्रवृत्तिकी होती है | वे अपने घरको एक मंदिर समान समझ कर उसका रख-रखाव तो करती ही हैं, घरमें आये आगन्तुकोंको देवतुल्य मानकर उसकी सेवा व सत्कार भी करती हैं | संतोषी प्रवृत्ति होनेके कारण उनके घरमें जितना हो वे उसीमें प्रेमसे जीवनयापन करती हैं | यह मैं आपको क्यों बता रही हूं क्योंकि साधना व धर्मके संस्कार न मिलनेके कारण आज ये स्त्री सुलभ गुण देखनेको बहुत कम मिलते हैं और यह भी एक कारण है कि या तो लोगोंके धनमें बरकत नहीं होती है या आर्थिक संकट रहता है ! स्वार्थी, कलहप्रिय व तमोगुणी स्त्रियां विपत्तियोंको अपने वर्तनसे आमन्त्रित करती हैं !
इसलिए स्त्रियों यदि अपने घरमें सुख समृद्धि लाना चाहती हैं तो अपने भीतर दिव्य गुणोंको आत्मासात करें, इससे आपके परिवारपर आया आर्थिक संकट टल ही नहीं सकता है वरन लक्ष्मी भी आकृष्ट होंगी !
उपर्युक्त तथ्यके मैंने अनेक बार प्रतीति ली है | मैं इसके दो उदाहरण देती हूं जिससे आपको यह तथ्य सुस्पष्ट हो | एकबार २०१८ मैं एक व्यक्तिसे किसी कार्य निमित्त मिली थी तो उनकी वृत्ति पूर्णत: धूर्तों जैसी ही नहीं थी अपितु वे वृत्तिसे भी तामसिक थे; किन्तु उनके पास बहुत धन था | एक बार मेरा उनके घर जाना हुआ तो उनके घर और उनकी पत्नीको देखकर मुझे उनके ऐश्वर्यका रहस्य ज्ञात हो गया | उनके घर बहुत ही स्वच्छ और पवित्र लगा | उनकी पत्नीको देखकर तो मैं आश्चर्यचकित हो गई, वे इतनी अच्छी थीं कि मैं आपको बता ही नहीं सकती ! उनका वर्तन उनके पतिके बिलकुल विपरीत था | वे बहुत ही सात्त्विक और सरल थीं, ऐसा कह सकते हैं कि वे कोई दैवी नारी थीं जो अपने प्रारब्ध भोगनेके लिए ऐसे पुरुषका वरन किया था, उनका सम्पूर्ण उनसे स्नेह करते थे |
ऐसे ही मैं २०११ में एक व्यक्तिसे मिली | वे बहुत ही सात्त्विक और किसी गुरुके भक्त थे | धर्म प्रसारके मध्य मेरा उनसे परिचय हुआ था | वे मुझे आग्रह करके अपने घर ले गए | उनके घर घुसते ही लगा जैसे कि मैं किसी भूतहा घरमें प्रवेश कर रही हूं और सिर भारी हो गया | पूरा घर अस्वच्छ एवं अव्यवस्थित तो था ही साथ ही एक दुर्गन्ध भी आ रही थी | जब उनके पत्नीके दर्शन हुए तो मुझे वस्तुस्थिति सुस्पष्ट हो गई ! उन्हें देखकर ही लग रहा था कि वे बहुत ही स्वार्थी और तमोगुणी हैं | कुछ समय पश्चात उस महोदयने अपने सात वर्षीय पुत्रसे परिचय कराया तो ज्ञात हुआ कि वह मनोरोगी है ! उनकी पत्नीने अपने पतिके सामने तो कुछ नहीं कहा और मुझे अनमने मनसे भोजन कराया | उस रात, मेरा निवास भी उनके घरपर था | बात ही बातमें उन महोदयने बताया कि मैं जो भी व्यापार करता हूं उसमें मुझे घाटा हो जाता है अर्थात उन्हें आर्थिक संकट थी |
प्रातः उन महोदयको कुछ आवश्यक कार्य निमित्त जाना पडा तो मैंने उनकी पत्नीका वीभत्स स्वरुप देखा | उनके पति जहां मुझे श्रद्धा भावसे फल काटकर खिलाकर गए थे वहीं उनकी पत्नीने जैसे कोई कुत्तेको रोटी पटक कर देता हो वैसे ही थालीमें दो रोटी भुनभुनाते हुए रखकर चली गई ! मैं तो भिक्षुणी हूं कोई प्रेमसे दे या अपमानित करके दे, मैं उसे गुरुप्रसाद मानकर ग्रहण कर लेती हूं | उनके इस वर्तनको देखकर मैंने वहांसे जानेका निर्णय लिया तो घरके स्वामीने आकर मुझे जाने नहीं दिया | वे इतने सरल हृदयी थे कि मैं बता ही नहीं सकती, वे फेसबुकपर मेरे लेखोंको नियमित पढते थे, वे जिज्ञासु भी थे | मैं द्वंद्वमें फंस गई | भैयाका स्वाभाव देखती और उनकी भक्ति देखती तो लगता उनके घर रहना चाहिए किन्तु उनकी पत्नीका वर्तन देखती तो लगता था कि इन्हें मेरा रहना अच्छा नहीं लगता है तो चले जाना चाहिए | किन्तु अंतत: भैयाके भावके आगे मुझे झुकना पडा | तीसरे दिन उनकी पत्नीने पुनः भैयाके जानेके पश्चात मेरे पास पटककर भोजनकी थाली रख दी | तबतक मेरी उनसे थोडी बहुत बातचीत हो चुकी थी इसलिए मैंने उनसे बात कर कुछ दृष्टिकोण देनेका सोचा और उन्हें बताया कि उनका वर्तन कैसे उनके लिए और उनके घरके लिए हानिकारक है ! कैसे उनके इस स्वाभावके कारण उनके घरसे लक्ष्मी चली गई है और उनके पुत्रको भी मनोरोग है | उसे इस बातपर विश्वास नहीं हो रहा था वे कहने लगीं कि उनके पति सदैव किसी न किसी साधकको लाकर उनके सिरपर पटक देते हैं और उन्हें उनके लिए भोजन बनाना पडता है और यदि वे आनाकानी करती हैं तो वे उनपर क्रोधित होते हैं ! मैंने कहा एक सप्ताहमें कितने लोगोंको लाते हैं वे ? आप मुझे बताएं, तो मैं उनसे बात करुंगी तो उन्होंने कहा एक महीनेमें पांच सात लोग तो ले ही आते हैं ! मैंने कहा क्या वे आकर मेरे समान रुकते हैं तो उन्होंने कहा नहीं आते हैं भोजन करते हैं और चले जाते हैं ! अर्थात उस स्त्रीको एक माहमें सात लोगोंके लिए भोजन बनाना भी कष्टप्रद होता था ! मैंने कहा जब आपके घरसे कोई भोजन करके जाता है तो उसकी अन्तरात्मा ‘अन्न दाता सुखी भवेत्’का आशीर्वाद देती है क्या आपको यह आशीर्वाद नहीं चाहिए ! आपके पुत्रको कष्ट है आपके घरमें आर्थिक कष्ट है ऐसेमें क्या सामान्य गृहस्थका जो धर्म है उसका पालन आपने नहीं करना चाहिए क्या ? आप तो घरपर ही रहती हैं, आपके पति सात्त्विक वृत्तिके हैं तो निश्चित ही वे अच्छे लोगोंको ही लेकर आते होंगे ऐसेमें उनका आतिथ्य आपको पुण्य देगा, यह सरल सी बात ध्यानमें रखें ! अब उनपर इस बातका कितना प्रभाव पडा यह तो मैं नहीं जानती किन्तु मेरा पुनः उस घरमें जाना नहीं हुआ ! यह तो मैंने दो उदाहरण आपके समक्ष इसलिए रखे हैं कि आप भी इसी प्रकार अपनी और दूसरोंकी समीक्षा कर अपने भीतर दिव्य गुणोंको आत्मसात कर सुखी रह सकें ! हमारे आध्यात्मिक उपचार केंद्रमें अभी तक जितने भी पुरुष आये जिन्हें आर्थिक कष्ट है उनमें ६० % स्त्रियोंकी वृत्ति अहंकारी, तमोगुणी एवं स्वार्थी थी !
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