चूक होनेपर कौनसा प्रयाश्चित लें ?


उपासनाके कुछ साधकोंसे जब व्यष्टि या समष्टि स्तरकी बडी चूकें होती हैं और इसकारण उन्हें प्रायश्चित लेने हेतु कहा जाता है तो वे पूछते हैं कि हम कौनसा प्रयाश्चित लें ?
तो आज आपको प्रायश्चितके विषयमें बताते हैं । सर्वप्रथम यह जान लेते हैं कि प्रायश्चित क्यों लेना चाहिए ? ईश्वरद्वारा रचित इस विश्वमें कर्मफल न्यायका सिद्धान्त चलता है अर्थात हम जो भी कर्म करते हैं उसके अनुसार हमें फल मिलता है । जब कोई भी जीव साधना आरम्भ करता है तो उसके दो उद्देश्य होने चाहिए । एक तो जो प्रारब्ध एवं संचितके कर्मफल हैं, वह इसी जन्ममें नष्ट हो जाएं एवं नूतन कर्मफल निर्माण न हो; प्रारब्धके कर्मफल तो चाहे हम चाहें या न चाहें वह तो इसी जन्ममें भोगकर हमें समाप्त करने ही होते हैं; किन्तु संचितके सर्व कर्मफल नष्ट होंगे ही, यह साधकद्वारा किस प्रकारके प्रयास हो रहे हैं ?, इसपर निर्भर करता है एवं कभी-कभी यह वर्तमान जन्ममें ही समाप्त हो जाता है तो कभी-कभी इसे समाप्त करनेमें अनेक जन्म लगते हैं । एक साधकका प्रयास अवश्य ही यह होना चाहिए कि वह अपने संचितमें अपने क्रियमाणसे नूतन कर्मफल न जोडे या कर्मफलकी तीव्रताको न्यून कर दे एवं  इसमें प्रायश्चितकी अहं भूमिका होती है । यदि हमसे कोई बडी चूक हो जाती है तो उसका कर्मफल अधिक तीव्र होता है; इसलिए चूक होते ही उसका प्रायश्चित लेनेका विधान हमारे यहां प्राचीन कालसे प्रचलित है । आपने पुराणोंमें ऐसी अनेक कथाएं पढी होंगी, जिसमें राजाद्वारा अनजानेमें किसी ब्राह्मण या गायकी हत्या हो जानेपर वे अपना सारा राज-पाट त्यागकर, वनमें जाकर तपस्याकर अपने पापका मार्जन करते थे । इसी प्रकार जब साधकोंसे भी यदि कोई बडी चूक हो जाए तो उन्हें त्वरित प्रायश्चित लेना चाहिए । अब प्रायश्चित कौन सा लें या क्या लें ?, यह प्रश्न बहुत बार साधक पूछते हैं । तो आपकी चूक यदि व्यष्टि स्तरकी है तो प्रायश्चित व्यष्टि स्तरका लें और यदि चूक समष्टि स्तरकी हो तो प्रायश्चित भी व्यष्टि स्तरका ले सकते हैं । जैसे किसीको कटाक्षकर उसके मनको व्यथित किया तो आप जो प्रिय पेय या खाद्य पदार्थ है, उसे कुछ समयके लिए त्याग सकते हैं या आपमें वाचालता हो तो कुछ घण्टोंके लिए अथवा कुछ दिवसोंतक मौन रख सकते हैं; किन्तु यदि समष्टि स्तरकी चूक हुई हो और उससे कार्यकी हानि हुई तो समष्टि स्तरकी कोई सेवाकर उस चूकका प्रायश्चित कर सकते हैं या आर्थिक भरपाई भी कर सकते हैं । चूककी तीव्रताके अनुसार प्रायश्चित लेना चाहिए । प्रायश्चितका अर्थ है, ऐसा प्रयास करना कि मन पुनः वैसी ही चूकको दोहरानेसे भयभीत हो जाए । वैसे चूक, हमारे दोषोंके कारण होती है; अतः वह न हो, इस हेतु दोष निर्मूलन करते रहना ही उसका स्थायी उपाय है ।


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