श्रीगुरु उवाच


शिष्यकी पात्रता अनुसार, गुरुके सिखानेकी पद्धति
उत्तम स्तरका शिष्य : ऐसा शिष्य व्यास मुनिके सुवचन ‘शिष्यादिच्छेत् पराजयम्’को चरितार्थ करता है, अर्थात गुरु उस शिष्यसे हार मान लेते हैं । इसका भावार्थ यह है कि ऐसे शिष्यसे गुरुकी अपेक्षा होती है कि वह आत्मज्ञानी हो जाए ।
मध्यम स्तरका शिष्य : ऐसे शिष्योंको गुरु उनकी शंकाओंका समाधानकर आध्यात्मिक ज्ञान देते हैं । यद्यपि वह अभी योगपर अधिकारी नहीं होता, योगारूढ नहीं होता अर्थात ईश्वरसे एकरूप नहीं होता, उसके लिए कर्मयोग अनुसार साधना करना योग्य होता हैं । ऐसे साधक सत्त्व-रज प्रधान होते हैं ।
कनिष्ठ स्तरका शिष्य : ऐसे शिष्योंद्वारा अत्यधिक सेवा करवानेके पश्चात गुरु उन्हें ज्ञान देते हैं । उन्हें अनेक जन्म साधना करनी पडती है । ऐसे शिष्य रजोगुणी प्रवृत्तिके होते हैं ।  – परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था
साभार : मराठी दैनिक सनातन प्रभात (https://sanatanprabhat.org)


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