जो विद्या विवेकको जाग्रत न करें वह विद्या कैसी ?
प्राप्त समाचार कुछ दिवस पूर्व एक सुप्रसिद्ध बहु राष्ट्रीय प्रतिष्ठानमें (MNC) कार्यरत एक उच्च शिक्षित युवाने ऋणके बोझसे व्यथित होकर आत्महत्या कर ली । दुःखकी बात यह है कि आत्महत्या करनेसे पूर्व उसने अपनी पत्नी एवंम अपने बच्चोंकी भी हत्या कर दी ! ऐसे ‘पढे-लिखे मूढ’ अपने साथ अपने परिवारका भी प्राण ले लेते हैं या उन्हें मरने हेतु बाध्य करते हैं, यह और भी दुखद तथ्य है ! यह कोई प्रथम बार नहीं हुआ है, आये दिन भिन्न कारणोंसे युवाओंद्वारा आत्महत्याके समाचार प्रकाशित होते ही रहते हैं जो बहुत ही चिंताजनक बात है ! वस्तुत: यह सब मैकाले शिक्षण पद्धतिका ही परिणाम है ! इसलिए मैं इस निधर्मी शिक्षण पद्धतिको आसुरी कहती हूं । क्योंकि मात्र यदि किसी व्यक्तिकी वृत्ति आसुरी हो जाये तो ही वह दूसरोंके प्राण ले सकता है चाहे अगला व्यक्ति उसका परिवार ही क्यों न हो ! ऐसे उच्च शिक्षणका क्या उपयोग जो आपको विपरीत परिस्थितिमें अपने मनको नियंत्रित करनेकी भी सीख नहीं देता है और निराशाकी ऐसे नरकमें धकल देता है कि व्यक्ति अकेला या सपरिवार आत्महत्या कर ले !
जो विद्या विवेकको जाग्रत न करें वह विद्या कैसी ? इसलिए पुनः धर्म अधिष्ठित गुरुकुल पद्धतिकी शिक्षण पद्धति आरम्भ करनेकी नितान्त आवश्यकता है ! (५.३.२०२०)
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