प्रेरक प्रसंग – ईश्वर प्रत्येक स्थानपर दिखाई नहीं देता; परन्तु तुम उसे अनुभव कर सकते हो !
तेरहवीं शताब्दीमें महाराष्ट्रमें एक प्रसिद्ध सन्त हुए ‘सन्त नामदेव’। कहा जाता है कि जब वे बहुत छोटे थे तभीसे भगवानकी भक्तिमें डूबे रहते थे । बालकाल्यमें ही एक बार उनकी माताने उन्हें भगवान विठोबाको प्रसाद चढानेके लिए दिया तो वे उसे लेकर मंदिर पहुंचे और उनके हठ व भोले भावके आगे भगवानको स्वयं प्रसाद ग्रहण करने हेतु प्रकट होना पडा । आज हम उसी महान सन्तसे सम्बंधित एक प्रेरक प्रसंग आपसे साझा कर रहे हैं ।
एक बार सन्त नामदेव अपने शिष्योंको ज्ञान-भक्तिका प्रवचन दे रहे थे । तभी श्रोताओंमें बैठे किसी शिष्यने एक प्रश्न किया, “गुरुवर, हमें बताया जाता है कि ईश्वर प्रत्येक स्थान उपस्थित है, परन्तु यदि ऐसा है तो वो हमें कभी दिखाई क्यों नहीं देते, हम कैसे मान लें कि वे सचमुच है, और यदि वे हैं तो हम उसे कैसे प्राप्त कर सकते हैं ?”
नामदेव मुस्कुराए और एक शिष्यको एक लोटा पानी और थोडा सा नमक लानेका आदेश दिया ।
शिष्य तुरन्त दोनों वस्तुएं लेकर आ गया ।
वहां बैठे शिष्य सोच रहे थे कि भला इन चीजोंका प्रश्नसे क्या सम्बन्ध, तभी सन्त नामदेवने पुनः उस शिष्यसे कहा , “पुत्र, तुम नमकको लोटेमें डालकर मिला दो” । शिष्यने ठीक वैसा ही किया ।
सन्त बोले , “बताइए, क्या इस पानीमें किसीको नमक दिखाई दे रहा है ?”
सबने ‘नहीं’में सिर हिला दिए ।
“ठीक है!, अब कोई इसे चखकर देखे , क्या चखनेपर नमकका स्वाद आ रहा है ?”, सन्तने पूछा ।
“जी”, एक शिष्य पानी चखते हुए बोला ।
“अच्छा ,अब इस पानीको कुछ देर उबालो ।”, नामदेवजीने निर्देश दिया ।
कुछ देरतक पानी उबलता रहा और जब सारा पानी भाप बनकर उड गया , तो सन्तने पुनः शिष्योंको लोटेमें देखनेको कहा और पूछा , “क्या अब आपको इसमें कुछ दिखाई दे रहा है ?” “जी , हमें नमकके कण दिख रहे हैं।”, एक शिष्य बोला ।
सन्त नामदेवजी मुस्कुराए और समझाते हुए बोले, “जिस प्रकार तुम पानीमें नमकका स्वाद तो अनुभव कर पाए; परन्तु उसे देख नहीं पाए उसीप्रकार इस जगमें तुम्हें ईश्वर प्रत्येक स्थानपर दिखाई नहीं देता; परन्तु तुम उसे अनुभव कर सकते हो । और जिस प्रकार अग्निके तापसे पानी भाप बनकर उड गया और नमक दिखाई देने लगा उसीप्रकार तुम भक्ति, ध्यान और सत्कर्मद्वारा एवं अपने विकारोंको प्रत्यनपूर्वक अन्त कर भगवानको प्राप्त कर सकते हो ।”
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