विषयमें आसक्त होकर उनमें लिप्त रहनेमें बडप्पन नहीं है , उसपर निग्रह करनेमें खरा बडप्पन है !
एक साधकने कहा कि आपको तो ज्ञात ही होगा कि मुझमें कितने बडे-बडे दुर्गुण हैं !
साधकों, दोष या दुर्गुण कुछ तो पूर्व जन्मोंके संसकरके कारण होते हैं तो कुछ इस जन्ममें हम अंगीकृत कर लेते हैं ! जैसे किसीके पास बहुत धन और वह भी अधर्मसे आ जाए तो वह मद्यपान करने लगता है या जुआ खेलने लगता है, व्यभिचार (परस्त्रीगमन) भी करनेका कुकर्म कर सकता है ! ऐसे अधर्म नित्य करनेसे उसके संस्कार निर्माण हो जाते हैं एवं वह एक दोषमें परिणत हो जाता है !
किन्तु सबसे महत्त्वपूर्ण क्या है ?, सर्वप्रथम अपने दोषोंको स्वीकार करना अर्थात मुझमें बुराई है उसके पश्चात उसे दूर करने हेतु प्रयत्न करना |
सदैव ध्यान रखे यदि महाव्यभिचारी व्यक्ति जो सती अनुसूयाका पति हुआ करता था, वह सुधर सकता है, रत्नाकर डाकू ऋषि बन सकता है तो आप स्वयंमें सुधार क्यों नहीं कर सकते हैं ? विषयमें आसक्त होकर उनमें लिप्त रहनेमें बडप्पन नहीं है , उसपर निग्रह करनेमें खरा बडप्पन है ! इसलिए इन्द्रिय निग्रह करना सीखें, एक बार वह सीख गए और साधना करने लगे तो उसमें जो आनंद मिलेगा वह संसारके किसी भी वस्तुसे प्राप्त नहीं हो सकता है !
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