आश्रममें अन्नपूर्णा कक्षको मांका मन्दिर मानकर सेवा करनी चाहिए !
वर्तमान कालमें सामान्य व्यक्तिपर रज-तमका आवरण इतना अधिक हो गया है कि सत्सेवा अर्थात ईश्वरप्राप्तिका माध्यम है; इसलिए उसे ‘सत्यम शिवम् और सुन्दरम’के सिद्धान्त अनुसार करना चाहिए, यह साधकोंको बार-बार सिखानेके पश्चात भी समझमें नहीं आया है । अभी आश्रममें दो गृहस्थ स्त्रियां दो माहसे थीं; किन्तु स्वयंस्फूर्तिसे अन्नपूर्णा कक्षको मांका मन्दिर मानकर सेवा करें, यह वृत्ति कहीं भी दिखाई नहीं देती थी । बार-बार बताना पडता था कि इसे स्वच्छ रखें, पवित्र रखें, व्यवस्थित रखें; क्योंकि घरमें वैसी ही रहती हैं न ! यह इन दोनोंकी बात नहीं है, वर्तमान समयमें ९५% स्त्रियां जब आश्रममें आती हैं तो उनकी ऐसी ही स्थिति होती है अर्थात समाजकी स्थिति कितनी दयनीय हो गई है ?, यह समझमें आता है । जब मैं अपने गुरुके अन्नपूर्णा कक्षमें सेवा करती थी तो साधक आकर मुझसे कहते थे कि जबसे आप यहां सेवा करने लगी हैं, तबसे हमें ऐसा लगता है जैसे यहांके स्पन्दन ही परिवर्तित हो गए हों ! यहां आकर बहुत अच्छा लगता है, ध्यान लग जाता है, दिव्य सुगन्ध आती है और पता नहीं क्या क्या…….
मुझे तो मेरी स्तुति, स्मृतिमें भी नहीं रहती है । मैं जब धर्मप्रसार करती थी तो सोचती थी कि क्या मुझे कभी मेरे श्रीगुरुके अन्नपूर्णा कक्षमें सेवाकी सन्धि मिलेगी ? और मेरे सर्वज्ञ श्रीगुरुने मेरी वह इच्छा पूर्ण की और मुझे वाराणसी, पनवेल एवं गोवाके आश्रमोंमें सेवाका यह सौभाग्य मिला । किन्तु आजकी स्त्रियां जब आश्रममें अन्नपूर्णा कक्षमें आती हैं तो उसके स्पन्दन ही परिवर्तित हो जाते हैं अर्थात उनके रज-तमयुक्त आचरणका प्रभाव अन्नपूर्णा कक्षमें भी देखनेको मिलता है । इसमें मात्र एक या दो स्त्रियां ही अपवाद हैं, शेष सबकी स्थिति वैसी ही है; इसलिए आज ९५% पुरुषों और बच्चोंको इतना कष्ट है । इसलिए सम्पूर्ण भारतमें मुझे कन्या गुरुकुल हिन्दू राष्ट्र होनेपर खोलना है, जिससे स्त्रियोंमें स्त्री सुलभ गुण आ सकें ! – (पू.) तनुजा ठाकुर
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