सदैव पाप और पुण्यकर्म किनसे होते हैं ?


पापंप्रज्ञानाशयतिक्रियमाणंपुनःपुनः।
नष्टप्रज्ञःपापमेवनित्यमारभतेनरः॥ – विदुर नीति
अर्थ : बार-बार क्रियमाणद्वारा पाप करनेसे मनुष्यकी विवेक बुद्धि नष्ट हो जाती है और जिसकी विवेक बुद्धि नष्ट हो चुकी हो, ऐसे व्यक्तिसे सदैव पापकर्म होते हैं ।
पुण्यंप्रज्ञावर्धयतिक्रियमाणंपुन: पुन: ।
वॄद्धप्रज्ञ: पुण्यमेवनित्यमारभतेनर: ॥ – विदुर नीति
अर्थ : बार-बार क्रियमाणद्वारा पुण्य करनेसे मनुष्यकी प्रज्ञा बढती है और जिसका विवेक जागृत होता है, ऐसा व्यक्ति सदैव पुण्य कर्म करता है ।
इस नीति श्लोकको पढकर सभीने ये प्रयास करने चाहिए कि क्रियमाणसे यथा सम्भव पाप कर्म न हो और विवेक जागृत रहे, इस हेतु सदैव प्रयत्नशील रहना चाहिए । विवेकका अर्थ है जब बुद्धि उचित और अनुचितका विश्लेषण कर योग्य वर्तन करना आरम्भ कर दे। मनुष्य और पशुमें यह एक मुख्य भेद है कि मानव अपने विवेकका उपयोगकर अपने जीवनका परमकल्याण सिद्ध कर सकता है । प्रारब्ध कर्म और क्रियमाणकर्ममें यही भेद है कि जहां प्रारब्ध-कर्मपर अपना नियन्त्रण नहीं होता है वहीं क्रियमाणकर्मके माध्यमसे कोई भी व्यक्ति तीव्र प्रारब्धके कर्मफलको भी भस्म कर सभी बन्धनोंसे मुक्त हो सकता है । अनेक पतित, कुकर्मी, चाण्डाल एवं निम्नयोनियोंमें जन्मे जीव भी अपने क्रियमाणकर्मसे योग्य पुरुषार्थ कर परमपदको (भक्तकेपदको) प्राप्त कर चुके हैं । यही है क्रियमाणकर्मका महत्त्व ! अतः कर्म करते समय सतर्क होकर कर्म करें ! और साधना करना, यह खरा क्रियमाण कर्म है ।


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