आश्रममें महाप्रसाद बनाते समय इन बातोंका ध्यान रखना चाहिए !
उपासनाके आश्रममें जब गृहस्थ साधक स्त्रियां प्रतिदिनके महाप्रसाद बनानेकी सेवा करती हैं तो वे जैसे अपने घरमें भोजन बनती हैं वैसे ही बनानेका प्रयास करती हैं ! आगे भी हमारे लेखोंको नियमित पढनेवाली स्त्रियां आश्रम आएंगी तो उन्हें आश्रममें महाप्रसाद बनाते समय किन बातोंका ध्यान रखना चाहिए, वह बताती हूं । उपासनाका आश्रम अन्य पारंपरिक आश्रमों समान गृहस्थोंद्वारा दिए गए भिक्षासे ही चलता है इसलिए यहां महाप्रसाद बनाते समय कुछ तथ्योंका ध्यान रखना चाहिए ।
* प्रथम तो जो उपलब्ध है उसका उपयोग करना चाहिए ! साथ ही महाप्रसाद बनाते समय वह सात्त्विक हो इसका विशेष ध्यान रहे । बहुत अधिक खट्टा, मसालेवाले, तीखा, चटपटा पदार्थ, राजसिक या तामसिक श्रेणीमें आता है; अतः महाप्रसाद ऐसा नहीं होना चाहिए ।
* यदि आश्रममें कोई सन्त हों तो उनसे उनका पथ्य अवश्य ही पूछकर लेना चाहिए एवं उनकी आयु अधिक हो तो यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उनके लिए बनाया जानेवाला महाप्रसादको सहजतासे चबा सकें ! जैसे एक बार मैंने एक स्त्री साधिकाको एक वृद्ध संत हेतु जब महाप्रसाद बनाने हेतु कहा तो उन्होंने जो रोटी सेंकी थी वह कडक थी जिसे वे चबा नहीं पा रहे थे | वृद्ध संतोंकी रोटी मुलायम हो एवं उसके साथ उन्हें दूध या तरीवाली तरकारी या पतली दाल देना चाहिए जिसमें वे रोटीको भिगोका खा सकें ! आप कहेंगे कि यह तो समान्य बात है किन्तु यह भी आजकी स्त्रियोंसे नहीं हो पाता है इसलिए बता रही हूं ।
* महाप्रसाद बनाते समय वह निर्धारित समय अनुसार बन जाए इसका ध्यान रखना अति आवश्यक होता है; क्योंकि आश्रममें अनुशासनका कठोरतासे पालन किया जाता है और विशेषकर समयका पालन बहुत ही महत्त्वपूर्ण होता है; इसलिए वही भोज्य पदार्थ बनाने चाहिए जो अल्प श्रम एवं अल्प समयमें बन जाए !
* उपासना जैसे आश्रममें समष्टि कार्य होता है ऐसेमें उसमें धन अधिक व्यय हो जाता है; इसलिए महाप्रसाद बनाते समय उसमें लगनेवाले पदार्थ सामान्य मूल्यके हों इसका ध्यान रखना भी अति आवश्यक होता है । वैसे भी ऋतु अनुसार फल व तरकारियां सस्ती होती हैं तो उसका उपयोग करना चाहिए ! जैसे एक बार एक साधक ५० लोगोंके लिए महाप्रसाद बनाने हेतु पनीर ले आये और उन्होंने कहा यह मेरी ओरसे है ! तो यदि आप साधना करते हैं तो आपका सब कुछ गुरु या ईश्वरका ही होता है । इसलिए महाप्रसादका नियोजन करते समय यह मेरे पैसेसे है ऐसा बोलना अहंका द्योतक होता है; इसलिए आश्रम व्यवस्थापकसे पूछकर सब करें । आश्रम ऐश्वर्य भोग हेतु नहीं है और न ही अपनी जिह्वाकी तृप्ति हेतु है, इसका ध्यान रखकर अन्नपूर्णा कक्षमें सेवा करें ।
* यदि महाप्रसादमें कुछ बच जाए तो उसका सदुपयोग कैसे करना है, यह भी आश्रम व्यवस्थापकसे पूछकर लें, उन्होंने अपने गुरुसे सीखा होता है अतः वे आपको उचित मार्गदर्शन करेंगे ।
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