भारत-नेपाल संकटमें हमारी भूमिका
सहस्रों वर्षोंसे सांस्कृतिक भारतका अखण्ड भाग रहे और वर्तमानमें भी भौगोलिक, सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, वैचारिक और आध्यात्मिक रूपसे भारतके अत्यन्त निकट, नेपालके व्यवहारमें अनायास कटुता आना न केवल राजनेताओंके लिए; अपितु दोनों देशोंकी जनताके लिए भी घोर चिन्ताका विषय है । आजसे पूर्व नेपालने कभी भारतके प्रति इस प्रकारकी कटु प्रतिक्रया नहीं दी थी । उसकी ओरसे मात्र कैलाश मानसरोवर यात्राको सुगम बनानेके लिए लिपुलेखके पास भारतद्वारा किए जा रहे मार्ग निर्माणपर, पूर्वमें कभी आपत्ति नहीं ली गई थी; परन्तु अब वह भारतीय क्षेत्रोंको अपना बता रहा है । ज्ञातव्य है कि नेपाली शासनने देशका एक नूतन विवादित मानचित्र प्रकाशित किया, जिसमें लिपुलेख, कालापानी, लिंपियाधुराके भारतीय क्षेत्रोंको अपना बताया गया है । जिसे भारत शासनने आधिकारिक रूपसे अमान्यकर दिया । यह तथ्य किसीसे छुपा नहीं है कि वर्तमान नेपालका वामपन्थी शासन, यह दुष्कृत्य चीनके संकेतपर कर रहा है । इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि नेपालसे लगे भारतीय सीमाके कुछ क्षेत्रोंमें, वामपन्थियोंद्वारा पथभ्रष्ट किए गए, कुछ लोगोंने नेपाल मूलके नागरिकोंका विरोध प्रारम्भकर, स्थितिको विकृत करनेका प्रयास किया ।
भारतकी अधिकांश समस्याओंकी भांति ही इस समस्याके मूलमें भारतके पूर्व प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरू और उनकी सन्तानें ही उत्तरदायी रही हैं । वर्ष १९५२ में नेपालके तत्कालीन राजा त्रिभुवन विक्रम शाहने नेपालके भारतमें विलयका प्रस्ताव नेहरूके सामने रखा; परन्तु प्रधानमन्त्री नेहरूने यह कहकर उनकी बात टाल दी कि इस विलयसे दोनों देशोंको लाभके स्थानपर हानि अधिक होगी । यही नहीं, इससे नेपालका पर्यटन भी समाप्त हो जाएगा । जबकि इसका मूल कारण यह था कि नेपाल जम्मू-कश्मीरकी भांति अपने विशेष अधिकारके अन्तर्गत अपने हिन्दू राष्ट्रके अभिज्ञानको (पहचानको) बनाए रखना चाहता था, जो हिन्दू द्वेषी नेहरूको स्वीकार नहीं था और इस कारण भारतकी एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रणनीतिक पराजय हुई, जिसकी क्षतिपूर्ति आजतक नहीं हो पाई है ।
वर्ष १९८९ में राजीव गांधीकी काठमांडू यात्राके समय सोनिया गांधी उनके साथ थीं । यह यात्रा भारत-नेपाल सम्बन्ध सुधारनेकी दिशामें एक योग्य प्रयास था; किन्तु राजीव गांधीके अहंकार तथा अदूरदर्शिताके कारण दोनों देशोंके सम्बन्ध और विकृत हुए । उस समय नेपाल विश्वका एकमात्र हिन्दू राजतन्त्रवाला देश था । पौराणिक, धार्मिक तथा ऐतिहासिक दृष्टिसे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पशुपतिनाथ मन्दिर जानेके राजीव गांधीके निर्णयतक राजीव और राजा बीरेंद्रके मध्य सब कुछ सम्यक चल रहा था; परन्तु तिरुपति बालाजी और जगन्नाथ पुरीके मन्दिरोंकी भांति ही पशुपतिनाथ मन्दिरमें भी अहिन्दुओंके जानेपर प्रतिबन्ध है और राजीवने सोनियाको साथ ले जानेका हठ किया; किन्तु पशुपतिनाथ मन्दिरके पुजारी उन्हें कोई छूट देने हेतु सज्ज (तैयार) नहीं हुए । राजा बीरेंद्रने भी पुजारियोंको किसी प्रकारका आदेश देनेमें अपनी असमर्थता व्यक्त की । ऐसा कहा जाता है कि राजा बीरेंद्रकी पत्नी रानी ऐश्वर्या पशुपतिनाथ मन्दिरके न्यासके कार्योंमें अतिशय रुचि लेती थीं और रानी ऐश्वर्याने ही सोनिया गांधीको मन्दिरमें न जाने देनेको लेकर कठोरता प्रदर्शित की थी जो उनके स्तरपर न केवल उनका अधिकार था; अपितु यह योग्य आचरण भी था । माना जाता है कि राजीवने इस घटनाको अपने अनादरके रूपमें लिया । उन्हें लगा कि राजा बीरेंद्रने उन्हें नीचा दिखाया है और वे पशुपतिनाथ मन्दिरसे बिना पूजा किए ही लौट गए ।
राजीवकी इस यात्राके पश्चात दोनों देशोंके सम्बन्ध सुधरनेके स्थानपर और बिगड गए । राजीव गांधीद्वारा शासित भारत शासनने नेपालको आर्थिक रूपसे प्रतिबन्धितकर दिया और इसका नेपालपर अत्यन्त कुप्रभाव पडा । वहां भारत विरोधी भावनाएं भडकने लगीं और राजा बीरेंद्रपर राजतन्त्र विरोधी शक्तियोंका दबाव बढने लगा ।
नेपालके नागरिक तन, मन, धनसे भारतका समर्थन करते हैं; परन्तु चीनने षड्यन्त्रपूर्वक भारत समर्थक राजतन्त्रको समाप्त करवाकर वहां, वामपन्थी राज स्थापितकर नेपालके संसाधनोंपर अनधिकार करनेका प्रयास किया । यह प्रक्रिया सतत चलती रही और जब राजतन्त्र समाप्त हो रहा था, तब वहांके राजाने भारतसे समर्थन व सहयोग मांगा था; परन्तु तब यहां मनमोहन सिंहके नेतृत्वमें चीनका समर्थन प्राप्त कांग्रेसका शासन था; इसलिए नेपालका समर्थन न कर वे घोषित हिन्दू राष्ट्रको मूकदर्शक बन समाप्त होते देखते रहे ! इस राजनीतिक मूर्खताके कारण, भारतको राजनीतिकरूपसे जो वैश्विक क्षति हुई, उसका क्षोभ प्रायः उन सभी भारतवासियोंको है, जो वामपन्थी विचारधारासे मुक्त हैं ।
त्रेतामें अवतरित भगवान विष्णुके अवतार भगवान ‘राम’ इस राष्ट्रके प्राण हैं और उनकी प्राणप्रिया माता जानकी मिथिलांचलसे (नेपाल) ही थीं । आज भी प्रत्येक चौथे वर्ष अयोध्यासे रामजीकी वरयात्रा (बारात) नेपाल जाती है और इसका भव्य तथा आत्मीयतापूर्ण स्वागत वहां किया जाता है । भगवान शिवके पशुपतिनाथ स्वरूपके दर्शन, मानसरोवर या कैलाश पर्वतके दर्शनकी कल्पनामें नेपाल सहज ही जुड जाता है । भारतकी सेना जब विकट युद्ध करती है तब भारतीय सैनिकोंके साथ “जय महाकाली, आयो गुरखाली” और “कायरतासे मरना अच्छा” जैसे घोषवाक्यों से आकाश गूंजाते गोरखा सैनिकोंके शौर्य और निष्ठापर सन्देह कैसे किया जा सकता है ? ऐसे नेपालसे, वर्तमानके सामान्य राजनीतिक संकटपर, भारतके शासक और प्रशासक, अपने स्तरपर चर्चाकर प्रकरणका, शीघ्र अथवा निकट भविष्यमें पटाक्षेपकर देंगे ।
हमें अपने नेपाली बन्धुओंसे इस समय सौम्य और स्नेहपूर्ण व्यवहार ही करना चाहिए ! वामपन्थियोंके कुचक्रसे बचते हुए, उन नेपालवासियोंको, विशेष रूपसे, हिन्दुओंको, अपनेसे पृथक न मानें ! वे मात्र प्रशासनिक व्यवस्थामें हमसे भिन्न हैं; परन्तु हमारी संस्कृति अभिन्न है । सांस्कृतिक रूपसे अभिन्न, भारतीयों और नेपालियोंको वर्तमान चीनी-वामपन्थी षड्यन्त्रका प्रत्युत्तर अपनी सामंजस्यतासे ही देना होगा । – दिनेश दवे
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