घरका वैद्य – सदाबहार पुष्प (भाग – १)


आज हम आपको ऐसे पुष्पके विषयमें बताने जा रहे हैं, जो दिखनेमें अत्यन्त साधारण है और सरलतासे मिल जाता है, वह है सदाबहारका पुष्प ! इसे सदाबहार इसलिए कहते हैं; क्योंकि इसमें १२ माह पुष्प आते हैं; इसलिए इसे बारह मासी, सदपुश्पा भी कहा जाता है । प्रायः लोग इसके पुष्पको पूजामें लेते हैं और इसके औषधीय प्रयोगके विषयमें नहीं जानते हैं; परन्तु यह सत्य नहीं है । यह पुष्प व इसका पौधा गुणोंका भण्डार है ।
सदाबहार एक झाडीनुमा पौधा होता है । इसके पत्ते गोल थोडी लम्बाई लिए अण्डाकार व अत्यन्त ही चमकदार व चिकने होते हैं ।  पांच पंखुडियोंवाला यह पुष्प श्वेत, गुलाबी, जामुनी आदि रंगोंमें खिलता है । इसके चिकने मोटे पत्तोंके कारण जलका वाष्पीकरण अल्प मात्रामें होता है, इसी कारण यह सरलतासे कहीं भी लग जाता है ।
 विकसित देशोंमें रक्तचाप शमनके शोधसे ज्ञात हुआ कि ‘सदाबहार’ झाडीमें क्षार अच्छी मात्रामें होता है; इसलिए अब यूरोप भारत चीन और अमेरिकाके अनेक देशोंमें इस पौधेकी कृषि होने लगी है । अनेक देशोंमें इसे खांसी, गलेकी खराश और फेफडोंके संक्रमणकी चिकित्सामें प्रयोग किया जाता है । सबसे रोचक बात यह है कि इसे मधुमेहके उपचारमें भी उपयोगी पाया गया है । वैज्ञानिकोंका कहना है कि सदाबहारमें दशकाधिक क्षार ऐसे हैं, जो रक्तमें शर्कराकी मात्राको नियन्त्रित रखते हैं ।
सदाबहार कषाय, तिक्त, उष्ण, लघु, रूक्ष, कफवातशामक, सौमनस्यजनन तथा हृद्य होता है । यह रक्तार्बुद तथा रक्तभाराधिक्य शामक है । इसका पञ्चाङ्ग अल्परक्तशर्कराकारक, निद्राजनन तथा अवसादक होता है । इसकी मूल निम्नरक्तदाबकारक, विषाक्त तथा आमाशयोद्दीपक होती है ।
वानस्पतिक नाम : Catharanthus roseus (Linn.) G. Don (केथारेन्थस रोजियस) Syn-Lochnera rosea (Linn.) Reichb., Vinca rosea Linn. कुल : Apocynaceae (ऐपोसाइनेसी)
अन्य भाषाओंमे नाम : अंग्रेजीमें रेड पेरीविन्कल; संस्कृतमें सदापुष्पा, नित्यकल्याणी; हिन्दीमें सदाबहार, सदासुहागिन, सदासुहागी ।


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