घरका वैद्य – स्वर चिकित्सा (भाग-३)


स्वरको तत्त्वोंके आधारपर विभाजित भी किया गया है । प्रत्येक स्वरका एक तत्त्व होता है । यह इडा या पिंगलासे (बाईं अथवा दाईं नासिका) निकलनेवाले वायुके प्रभावसे नापा जाता है ।
* श्वासका दैर्घ्य १६ अंगुल हो तो पृथ्वी तत्त्व,
* श्वासका दैर्घ्य १२ अंगुल हो तो जल तत्त्व,
* श्वासका दैर्घ्य ८ अंगुल हो तो अग्नि तत्त्व,
* श्वासका दैर्घ्य ६ अंगुल हो तो वायु तत्त्व,
* श्वासका दैर्घ्य ३ अंगुल हो तो आकाश तत्त्व होता है ।
यह तत्त्व सदैव एक जैसा नहीं रहता । तत्त्वके परिवर्तित होनेके साथ ही उसके फलादेश भी परिवर्तित हो जाते हैं ।
स्वरोदय विज्ञानसे सम्बन्धित कुछ महत्त्वपूर्ण निर्देश :
* स्नान, भोजन, शौच आदिके समय दाहिना स्वर रखें !
* पानी, चाय, कॉफी आदि पेय पदार्थ पीने, मूत्र त्याग करने, परोपकारके कार्य करने आदिमें बायां स्वर होना चाहिए ।
* कभी भी किसी शुभ कार्यमें जाएं तो जिस ओरके नाकमें स्वर चल रहा हो उस ओरका पांव पहले आगे बढाएं तो कार्य सिद्ध हो जाता है ।
* जब शरीर अत्यधिक ‘गर्मी’ अनुभव करे, तब दाहिनी करवट लेट लें और बायां स्वर आरम्भ होने दें ! इससे तत्काल शरीर ठण्डक अनुभव करेगा । उसी प्रकार जब शरीर अधिक शीतलता अनुभव करे, तब बाई करवट लेट लें, इससे दाहिना स्वर आरम्भ हो जाएगा और शरीर शीघ्र ‘गर्मी’ अनुभव करेगा ।
* प्रतिदिन स्नानके पश्चात जब भी वस्त्र पहनें, पहले स्वर देखें और जिस ओरका स्वर चल रहा हो उस ओरसे वस्त्र पहनना आरम्भ करें और साथमें यह मन्त्र बोलते जाएं, “ॐ जीवं रक्ष ।” इससे दुर्घटनाओंका संकट सदैवके लिए टल जाता है ।
* कई बार ऐसे अवसर आते हैं, जब कार्य अत्यन्त आवश्यक होता है; किन्तु स्वर विपरीत चल रहा होता है । ऐसे समयमें स्वरकी प्रतीक्षा करनेपर उत्तम अवसर हाथसे निकल सकता है; अतः स्वर परिवर्तनके द्वारा अपने अभीष्टकी सिद्धिके लिए प्रस्थान करना चाहिए या कार्य प्रारम्भ करना चाहिए । स्वर विज्ञानका सम्यक ज्ञान आपको सदैव अनुकूल परिणाम प्रदान करवा सकता है ।
इस प्रकार ग्रहोंको देखे बिना स्वर विज्ञानके ज्ञानसे अनेक समस्याओं, बाधाओं एवं शुभ परिणामोंका बोध इन नाडियोंसे होने लगता है, जिससे अशुभका निराकरण भी सरलतासे किया जा सकता है ।
इस विज्ञानके अनुसार गुरु, मित्र, अधिकारी, राजा, मन्त्री आदिसे वाम स्वरसे ही वार्ता करनी चाहिए । कई बार ऐसे अवसर भी आते हैं, जब कार्य अत्यन्त आवश्यक होता है; किन्तु स्वर विपरीत चल रहा होता है । ऐसे समय स्वर परिवर्तित करनेके प्रयास करने चाहिए, इस विषयमें हम आपको पूर्वके अंकमें बता ही चुके हैं । तथापि संक्षेपमें यह जान लें कि स्वरको परिवर्तितकर अपने अनुकूल करनेके लिए कुछ उपाय कर लेने चाहिए, जैसे जिस नथुनेसे श्वास नहीं आ रही हो, उससे दूसरे नथुनेको दबाकर पहले नथुनेसे श्वास निकालें ! इस प्रकार कुछ ही देरमें स्वर परिवर्तित हो जाएगा । घी खानेसे वाम स्वर और मधु खानेसे दक्षिण स्वर चलना प्रारम्भ हो जाता है ।


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