घरका वैद्य – दुग्ध चिकित्सा (भाग-४)


रोगके पूर्णतः अथवा किसी-किसी दशामें अंशतः ठीक हो जानेपर तक्रकल्प (छाछ, मट्ठा) आरम्भ करना चाहिए । रोगीको आरम्भमें कुछ दिनोंतक फल और तरकारीपर (सब्जियोंपर) रहना चाहिए, उसके पश्चात २ से ४ दिनोंका उपवास करना चाहिए । उपवासके दिनोंमें केवल नींबूका रस जलमें मिलाकर लेना चाहिए और प्रतिदिन गुनगुने पानीका ‘एनिमा’ लेकर पेटको स्वच्छ कर लेना चाहिए । पांचवे दिन प्रातःकालसे तक्रकल्प आरम्भ कर देना चाहिए । प्रत्येक २-२ घण्टेके अन्तरालकपर नीचे दी हुई तालिकाके अनुसार तक्र पीना चाहिए :
* प्रथम दिन         आधा-आधा छटांक
* दूसरे दिन          एक-एक छटांक
* तीसरे दिन         डेढ-डेढ छटांक
* चौथे दिन          दो-दो छटांक
* पांचवें दिन         ढाई-ढाई छटांक
* छठे दिन           डेढ-डेढ घण्टेके अन्तरालसे तक्र पिएं
* सातवें दिन         तीन-तीन छटांक
* आठवें दिन         साढे तीन-साढे तीन छटांक
* नवें और दसवें दिन   चार-चार छटांक ९ बार
* ग्यारहवें दिनसे      एक-एक घण्टेके अन्तरालपर चार-चार छटांक तक्र (छाछ) सेवन करें
* बारहवें दिन         पांच-पांच छटांक
* तेरहवें दिन          छह-छह छटांक १२ बार
* चौदहवें दिनसे      ४५-४५ मिनिटके अन्तरालपर छह-छह छटांक १६ बार तक्र पिएं !
इस प्रकार ४० दिनोंतक या इससे भी अधिक दिनोंतक तक्रकल्प चलाया जा सकता है । सुविधा, आयु, शक्तिके अनुसार तक्रकी उपर्युक्त मात्रा न्यूनाधिक भी की जा सकती है । तक्रमें (मठामें) कुछ भी मिलाना नहीं चाहिए ।
   जिस दिन तक्रकल्पकी समाप्ति करनी हो, उस दिन तक्र पीनेके क्रमको आधा कर देना चाहिए अर्थात आधा दिन सवेरेसे दोपहरतक तक्र और दोपहर पश्चात फल या फलोंका रस लेना चाहिए । दूसरे दिन तक्र (छाछ) उतना ही रखें और दोपहर पश्चात फल तथा सन्ध्याके समय उबली हुई तरकारी (साग-सब्जी) लें, तदुपरान्त दोनों समय उबली हुई तरकारी और मध्यमें फलोंका सेवन करें और उसके पश्चात धीरे-धीरे साधारण भोजनपर आ जाना चाहिए ।
    कल्पके समय दिनमें यदि अरुचि हो जाए तो मध्यमें १०-१० बूंद नींबूका रस चूस लेना चाहिए ।
   यदि कल्पके दिनोंमें ज्वर आ जाए तो कल्प बन्द करके उपवास करना चाहिए और ज्वर दूर हो जानेपर कल्प पुनः आरम्भ कर देना चाहिए ।
   कोष्ठबद्धता अर्थात कब्ज टूटनेतक ‘एनिमा’ लेते रहना चाहिए ।
   यदि कल्पके दिनोंमें ‘दस्त’ आने लगें तो तक्रकी मात्रा आधी कर देनी चाहिए ।


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