घरका वैद्य – दुग्ध चिकित्सा (भाग-३)
मुखमें छाले : मुखमें छाले आ गए हों तो रातको सोते समय छालोंपर दूधकी मलाई लगानेसे छाले ठीक हो जाते हैं । प्रातः खाली पेट गायके दहीके साथ पका हुआ छींटेवाला (चित्तीदार) केला खानेसे भी मुंहके छाले ठीक हो जाते हैं ।
मलबन्ध (कब्ज) : यदि मलबन्ध (कब्ज) हो तो लोग कहते हैं कि तब दूध नहीं पीना चाहिए । दो सौ पचास मिलीलीटर गायके दूधके ‘ताजे’ मट्ठेके साथ अजवायनका पांच ग्राम चूर्ण मिलाकर प्रातःकाल खाली पेट पीनेसे मलबन्ध (कब्ज) दूर हो जाती है ।
अर्श (बवासीर) : पांच ग्राम गायके घीमें दो ग्राम जायफल घिसकर मिला लीजिए । इस मिश्रणको ‘बवासीर’के मस्सोंपर लगानेसे उनकी पीडा समाप्त हो जाती है । या पचास ग्राम गायके मक्खनमें दस ग्राम सूक्ष्म पिसा हुआ सेंधा लवण (नमक) मिलाएं ! इस लेपको ‘बवासीर’के मस्सोंपर प्रातः और सायं शौचके उपरान्त लगानेसे मस्सा नष्ट हो जाता है ।
अतिसार (पेचिस) : पच्चीस मिलीलीटर गायके ‘ताजे’ दूधको उबाल लीजिए, उसके पश्चात उसमें लगभग दस ग्राम मधुको मिलाकर रखें ! जब दूध ठण्डा हो जाए तो कटोरीमें एक चौथाई नींबूका रस निकालकर रखें ! अब इस कटोरीमें दूधको डालकर तुरन्त पी लें, जिससे नींबूके कारण दूध पेटमें जाते-जाते फट जाए । प्रातः और सांय दोनों समय इसका प्रयोग करें ! कुछ ही दिनोंमें ‘पेचिस’ जडसे समाप्त हो जाएगी ।
पीलिया : चालीस ग्राम गायके दूधकी दहीमें दस ग्राम दूधका चूर्ण मिलाकर प्रातःकाल खाली पेट दिनमें एक बार, एक सप्ताहतक सेवन करें !
तक्रकल्प : दुग्धकल्पके अनुकूल प्रभाव न पडनेपर तक्रकल्पसे अर्थात छाछसे (मठा) भी वही लाभ उठाए जा सकते हैं । तक्रकल्प अनेक रोगोंमें जैसे कोष्ठबद्धता, ‘दस्त’, संग्रहणी, खाज-खुजली, उकवत, यक्ष्मा, ज्वर, चौथेया ज्वर, अर्श (बवासीर), जलोदर, उच्च रक्तचाप, निम्न रक्तचाप, श्वासरोग अर्थात ‘दमा’, गर्भाशय सम्बन्धी रोग, यकृत दोष तथा मूत्राशयकी पथरी आदिमें लाभप्रद है ।
यह कल्प प्रायः ४० दिनोंतक लिया जाता है । कल्पमें घृतहीन तक्र उपयोगमें लाना चाहिए । तक्र अधिक खट्टा भी नहीं होना चाहिए ।
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