घरका वैद्य – प्राणायाम चिकित्सा – उज्जायी प्राणायाम (भाग-१)
हमारे सुप्रसिद्ध वैदिक षड्दर्शनोंमें तो ‘योगदर्शन’ एक स्वतन्त्र दर्शन है । योगका उल्लेख वैसे तो वेदोंमें भी मिलता है अर्थात योगका विज्ञान, योगका शास्त्र अति प्राचीन है । यह हमारी संस्कृतिका अविभाज्य अङ्ग है ।
परम्परानुसार योगदर्शनके प्रणेता महर्षि पतञ्जलिको भगवान श्रीशेषका अवतार माना जाता है । अठारहवीं शताब्दीके पण्डित श्रीरामभद्र दीक्षितजीके ‘पतञ्जलिचरित’ नामक ग्रन्थमें महर्षि पतञ्जलिकी स्तुतिमें एक श्लोक ऐसा आता है :
योगेन चितस्य पदेन वाचां । मलं शरीरस्य च वैद्यकेन ॥
यो पाकरोत्तं प्रवरं मुनीनां । पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोस्मि ॥
वाणीमें अशुद्धता न रहे, वाणी शुद्ध हो जाए, शब्दोंका मर्म समझमें आ सके, शब्दोंका सामर्थ्य समझमें आ सके; इसलिए महर्षि पतञ्जलिने शेषरूप अर्थात अपने मूलरूपमें व्याकरणशास्त्रकी रचना की । पतञ्जलिके नामसे एक व्याकरण महाभाष्य भी विख्यात है । इसी प्रकार मनका मैल दूर होने और आत्मस्वरूपकी प्राप्तिके लिए महर्षि पतञ्जलिने योगशास्त्रकी रचना की ।
प्राणायाम चिकित्सा अन्तर्गत इस अंकमें हम उज्जायी प्राणायामके विषयमें जानेंगे ।
उज्जायी प्राणायाम :
उज्जायीका शाब्दिक अर्थ होता विजयी या जीतनेवाला अर्थात इस प्राणायामके अभ्याससे हम वायुपर अपनी विजय प्राप्त कर सकते हैं । यहांपर वायुका अर्थ है, श्वास अर्थात इस प्राणायामका अभ्यास करनेसे हम अपनी श्वासोंपर विजय प्राप्त कर सकते हैं ।
उज्जायी प्राणायाम करते समय समुद्रकी लहरोंके समान ध्वनि आती हैं; इसलिए इसे ‘ओशिन ब्रीथ’ भी कहा जाता है । जब इस प्राणायामको किया जाता है तो शरीरमें उष्ण (गर्म) वायु प्रवेश करती है और दूषित वायु निकलती है । इस प्रणायामका अभ्यास शीतको दूर करनेके लिए भी किया जाता है । इसका अभ्यास तीन प्रकारसे किया जा सकता है; खडे होकर, लेटकर तथा बैठकर ।
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