घरका वैद्य – प्राणायाम चिकित्सा – शीतकारी प्राणायाम (भाग-२)


प्राणवायुकी (ऑक्सीजनकी) मात्राको बनाए रखता है : शीतकारी प्राणायामके नियमित अभ्यास करनेसे शरीरमें ‘ऑक्सीजन’की मात्रा अल्प नहीं होती है ।
रक्त संचार प्रक्रियाके लिए : इसके नियमित अभ्याससे शरीरमें रक्त संचार प्रक्रियामें लाभ मिलता है । यदि हमारा रक्त संचार सामान्य रहे तो न ही हृदयरोग होंगे और न ही अन्य रोग ।
शरीरमें स्फूर्ति : इसको करनेसे शरीरकी थकान दूर होकर शरीरमें स्फूर्ति आती है । मनोवैज्ञानिकोंके अनुसार थकान, रुचि और इच्छा न्यून होनेकी अवस्था है । शारीरिक थकानका सामान्य अर्थ; मन अथवा शरीरकी सामर्थ्य न्यून हो जानेसे लिया जाता है । ऐसी स्थितिमें व्यक्तिसे कार्य नहीं होता अथवा अत्यल्प होता है । थका हुआ व्यक्ति निष्क्रिय पडा रहता है । इसके अभ्याससे समूचे दिवस शरीरमें स्फूर्ति बनी रहती है ।
अनिद्रामें लाभप्रद : अच्छी निद्रा आना आवश्यक होता है; क्योंकि इससे थकान दूर होकर शरीर ऊर्जा और शक्तिसे भर जाता है । यदि आपकी निद्रा ही अच्छी प्रकारसे पूर्ण नहीं होगी तो आपके लिए यह घातक सिद्ध हो सकता है । यदि आपको निद्राकी समस्या है तो आप इस प्राणायामके अभ्याससे निद्रा न आनेकी समस्यासे मुक्ति पा सकते हैं ।
स्वेद (पसीना) अधिक आनेके रोगमें लाभप्रद : इससे शरीरमें शीतलता आती है और स्वेद अल्प आता है । यद्यपि स्वेद आना हमारे शरीरका स्वाभाविक कार्य है, जिससे शरीरका तापमान नियन्त्रणमें रहता है । स्वेद त्वचापर पृथक होता है और वाष्प बनकर निकलता है, जिससे शरीर ठण्डा होने लगता है । यह केवल तब होता है जब आवश्यकता होती है अर्थात जब शरीरका तापमान एक सीमासे ऊपर हो जाए ।
भूखमें वृद्धि : इस प्राणायामसे भूख-प्यास न लगनेकी समस्या दूर होती है । भूख न लगनेको चिकित्सकीय भाषामें ‘एनोरेक्सिया’ (Anorexia) या अरुचि-रोग कहते हैं । ‘एनोरेक्सिया’ (Anorexia) या अरुचि-रोगमें रोगीको भूख नहीं लगती, यदि भोजन किया भी जाए तो वह अरुचिकर लगता है । इस रोगसे पीडित व्यक्ति १ या २ ग्राससे अधिक नहीं खा पाता और उसे बिना कुछ खाए-पिए ही खट्टी डकारें आने लगती हैं ।


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