घरका वैद्य – मर्दन चिकित्सा (भाग-९)


विशेष : ध्यान रहे दुग्ध स्नानके पश्चात जलस्नान करनेपर दूधकी चिकनाई अथवा गन्ध शरीरपर शेष नहीं रहनी चाहिए, अन्यथा स्नान स्वास्थ्यकर सिद्ध नहीं होगा तथा ऐसे त्रुटिपूर्ण स्नानसे हानि भी हो सकती है ।
     दुग्धस्नानमें कच्चे (बिना ओटाए) और नूतन दूधका ही प्रयोग करना चाहिए ! शरीरके बालोंवाले भागपर दूधका प्रयोग निरर्थक है । बालोंके मलको दूर करनेके लिए सर्वोत्तम योग बेसनका घोल है ।
छोटे बच्चोंका सर्वोत्तम व्यायाम मर्दन (मालिश) : छोटे बच्चों एवं बलहीन वृद्धजनों व अशक्त स्त्री-पुरुषोंके लिए भी मर्दन (मालिश) ही एक ऐसी क्रिया है जो उन्हें व्यायामका पूरा-पूरा लाभ प्रदान कर सकती है । छोटे बच्चे स्वभावतः अपने हाथ-पैर फेंकते रहते हैं । इससे उनके आवश्यक अङ्गों, जैसे हाथ, पैर, पेट तथा छातीकी मांसपेशियोंका यथेष्ट व्यायाम हो जाता है । प्रायः हमारे घरोंमें आज भी नवजात शिशुओंका मर्दन (मालिश) किए जानेका प्रचलन है । इस सम्बन्धमें प्रायः एक ही त्रुटि हो जाती है कि मर्दनके (मालिशके) पश्चात चाहे वह तेल मर्दन हो अथवा उबटन, बच्चोंको नहलानेके पश्चात उनका सारा शरीर सूखे वस्त्रसे भलीभांति पोंछा नहीं जाता और यही कारण है कि उन बच्चोंको जितना लाभ मर्दनसे (मालिशसे) होना चाहिए, उतना नहीं होता । यदि दिनमें तीन बार नहीं तो कमसे कम प्रातः संध्या दो बार बच्चोंका मर्दन (मालिश) अवश्य होना चाहिए ! ग्रीष्मकालमें ठण्डे पानीसे और जाडेकी ऋतुमें गुनगुने पानीसे उन्हें नहलाकर ठीकसे पोंछ देना चाहिए ! दुर्बल बच्चोंके लिए ग्रीष्मकालमें भी उनके शरीरके तापमानके बराबर गुनगुने पानीका प्रयोग किया जा सकता है; किन्तु प्रत्येक दशामें इस बातका ध्यान रखा जाना चाहिए कि ‘गर्म’ या गुनगुना पानी बच्चोंके सिर और आंखोंपर न पडने पाए ।
निम्नांकित दशाओंमें मर्दन (मालिश) करना निषेध है
केवलं साम दोषेषु न कथं च न्योज येत ।
तरुण ज्वर जीर्णाच नाभ्याक्त कथंचन ॥
तथा विरिक्तो वाताश्च निरुढोयश्ग मानवः ।
पवयोः कृच्छ ताव्या घेरसाध्यत्वमथापिवा ॥
शेषाणां तदहः प्रेक्ता आग्निमांद्यान्द यो गदाः ।
सन्तर्पणं समुत्त्थानां रोगाणां नैव कारयेत ॥
   अर्थात  जिसे साधारणतय दोष हों, नवीन ज्वर हो, अजीर्ण हो, ‘जुलाब’ लिए हों, जिसे वमन (उल्टी) आता हो तथा जिसने ‘एनिमा’ लिया हो । ‘एनिमा’ लेते समय जब पेटमें पानी चढने लगे तो पेटको बाईंसे दाहिनी ओरको हलके-हलके मलना चाहिए और पानी भी पेटमें रुका रहे तो उस समय भी पेटकी हलकी-हलकी ‘मालिश’ दाहिनी ओरसे बाईं ओर करें, ऐसा नियम है । जो ‘एनिमा’ विधानमें सम्मिलित है, बिना इस क्रियाके ‘एनिमा’ पूर्ण नहीं कहा जा सकता ।


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