तृप्ति देसाईने शिरडी मन्दिरके नियमको लेकर किया उपहास शिरडीके साईबाबा मन्दिर न्यासने श्रद्धालुओंको सभ्य प्रकारसे


०३ दिसंबर, २०२०

वस्त्र धारणकर आनेका आग्रह किया है । इसपर सामाजिक कार्यकर्ता तृप्ति देसाईने प्रश्न किया है कि श्रद्धालुओं तथा पुजारियों हेतु मन्दिर परिसरमें भिन्न-भिन्न मापदण्ड क्यों ? मंगलवार, १ दिसम्बरको तृप्ति देसाईने एक लघु दृश्यपट सन्देश देते हुए कहा है कि मन्दिर न्यासद्वारा श्रद्धालुओंके लिए इस प्रकारका सूचना पट लगाना अनुचित है । यह अभिव्यक्तिकी स्वतन्त्रताके संवैधानिक अधिकारका हनन है । तृप्ति देसाईने कहा कि पुजारी अर्धनग्न होते हैं; परन्तु किसी श्रद्धालुने आपत्ति नहीं की है ! ऐसे सूचनापट्ट त्वरित हटाए जाएं; अथवा हम अर्थात वह स्वयं तथा अनेक कार्यरकर्ता शिरडी आकर ऐसे सूचनापट्ट हटा देंगे ।
शिरडी साईबाबा संस्थान न्यासके मुख्य कार्यकारी अधिकारी कान्हुराज बगातेने इसपर स्पष्टीकरण देते कहा है कि कुछ लोग मन्दिरमें असभ्य वस्त्र धारण करके प्रवेश करते हैं । कुछ श्रद्धालुओंद्वारा इसपर आपत्ति प्रकट की गई । इसके उपरान्त उन्होंने सभी श्रद्धालुओंसे सभ्य वेशभूषा धारण करके आनेका आग्रह किया है, किसीपर वेशभूषा सम्बन्धी कोई नियम नहीं लगाया गया है ।
तृप्ति देसाईने कहा कि विभिन्न धर्म, जातियोंके लोग शिरडी दर्शन हेतु आते हैं । भारतका संविधान सभीको अभिव्यक्तिकी स्वतन्त्रता देता है; जिसमें क्या बोलना, कैसे वस्त्र धारण करनाभी सम्मिलित है ?
उल्लेखनीय है कि तृप्ति देसाईने बलपूर्वक शनि मन्दिर शिमगापुर पहुंचकर शनिदेवपर तेल अर्पण किया था । जबकी वहां महिलाओंका मूर्तिके निकट प्रवेश वर्जित है । तृप्तिने २०१९ में सबरीमाला मन्दिर जाकर नियम उल्लङ्गनका प्रयास किया था; परन्तु वे असफल होकर लौट आई थीं ।

        तृप्ति देसाई सदृश कथित सामाजिक कार्यकर्ता व धर्मद्रोही स्त्रियां समाजपर कलङ्कके रूपमें सामने आ रहे हैं, जिन्हें न स्वयं ज्ञान है और जो कुत्सित ज्ञान है, वह अन्योंपर थोपना चाहती हैं । अभिव्यक्तिकी स्वतन्त्रता भी योग्य व्यक्तियोंको ही होनी चाहिए; अन्यथा समाजमें विषमता उत्पन्न होती है और रही बात इनकी मन्दिर दर्शन व श्रद्धाकी, तो इनकी श्रद्धा मात्र दिखावा होती है । तभी उन्हें पुनः कभीभी शनि मन्दिर दर्शनकी इच्छा नहीं हुई । धार्मिक नियमोंका पालनकर देवस्थानोंकी पवित्रता यथावत रखना हमारा कर्त्तव्य है । ऐसे धर्मद्रोहियोंका सामूहिक विरोध होना आवश्यक है । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ

स्रोत : ऑप इंडिया



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