०४ दिसंबर, २०२०
उत्तर प्रदेशमें लव जिहादके बढते प्रकरणोंपर अंकुश लगानेके लिए लाए गए धर्मान्तरण अध्यादेशको उच्चतम न्यायालयमें २ याचिकाएं प्रस्तुत करके चुनौती दी गई है । इन याचिकाओंमें मांग की गई है कि अध्यादेशको असंवैधानिक घोषित करके इसे लागू न करनेका निर्देश दिया जाए ।
ज्ञात हो कि विगत दिवसों लव जिहादको रोकनेके लिए योगी शासनने ऐतिहासिक पग उठाते हुए ‘कैबिनेट’की बैठकमें ‘उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म सम्परिवर्तन प्रतिशेध अध्यादेश-२०२०’को स्वीकृति दी थी ।
ऐसेमें इसके प्रति अनेक लोगोंने आवाज उठाई और इसको संविधानके विरुद्ध बताया । अब ‘सुप्रीम कोर्ट’में प्रविष्ट याचिकाओंमें प्रथम याचिका देहलीके एक अधिवक्ताकी (वकीलकी) है और द्वितीय देहली व प्रयागराजमें वकालतकी शिक्षा ग्रहण कर रहे छात्रोंकी है ।
इन याचिकाओंमें कहा गया है कि ये उत्तर प्रदेशका लव जिहाद विधान और उत्तराखण्डका विधान ‘आर्टिकल’ २१के अन्तर्गत मिलनेवाले निजताके अधिकार और ‘आर्टिकल’ २५से सम्बन्धित मिलनेवाले धार्मिक स्वतन्त्रताके अधिकारका उल्लङ्घन करते हैं ।
इन याचिकाओंमें मांग की गई है कि अध्यादेशको असंवैधानिक घोषित करके इसे लागू न करनेका निर्देश दिया जाए ।
उत्तर प्रदेशमें धर्मान्तरण अध्यादेश आनेके उपरान्त बरेलीके एक लव जिहाद प्रकरणमें उवैश खानको प्रथम बखर बन्दी बनाया गया है । उवैश खानपर आरोप है कि वह विवाहित महिलापर धर्म परिवर्तन करके विवाहका दबाव बना रहा था ।
प्राथमिकीके अनुसार, वह युवतीको पिछले तीन वर्षोंसे प्रताडित कर रहा था और उसके विवाहके उपरान्त भी उसके घरमें घुसकर धमकी दे आया था कि वो उसके वैवाहिक बन्धन तोडकर स्वयं निकाह करेगा । आज बन्दी बनाए जानेके पश्चात उवैश खानको न्यायालयमें प्रविष्ट किया गया था, जहांसे उसे कारावास भेज दिया गया ।
अनेक लव जिहादके प्रकरणों और हिन्दू युवतियोंकी मानसिक व शारीरिक प्रताडनाके पश्चात ही यह विधान बनाया गया है; परन्तु आज हिन्दू ही हिन्दुओंके शत्रु बने बैठे हैं । इन अधिवक्ताओंने कितनी जिहाद पीडिता युवतियोंके अभियोग लडे हैं ? ऐसे हिन्दूद्रोही, राष्ट्रद्रोही व धर्मद्रोही व्यक्तियोंको उचित दण्ड मिलना चाहिए ! – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
स्रोत : ऑप इंडिया
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