‘हलाल’ मांस हिन्दू-सिखके लिए वर्जित, ‘होटलों’ मांसकी आपणिमें लगाना होगा सूचनापट्ट, ‘एसडीएमसी’का प्रस्ताव पारित
२५ दिसम्बर, २०२०
बकरे अथवा मुर्गेका मांस कोई ‘हलाल’ खा रहा है या ‘झटका’ ?, यह प्रायः भोजनालयोंमें ज्ञात नहीं होता है; परन्तु अब देहलीके जो ‘होटल’ व आपणि ‘एसडीएमसी’के (दक्षिण देहली म्युनिसिपल कारपोरेशन) अन्तर्गत आते हैं, उन्हें ‘हलाल’ अथवा ‘झटका’का सूचनापट्ट टांगकर रखना आवश्यक है ।
इस सम्बन्धमें छतरपुर ‘काउंसिलर’ अनिता तंवरने प्रस्ताव प्रस्तुत किया था, जिसे ‘मेडिकल रिलीफ एंड पब्लिक हेल्थ पैनल’ने ९ नवम्बरको ‘स्टैंडिंग’ समितिके समक्ष प्रस्तुत किया था । यह प्रस्ताव पारित हो चुका है और अब यह ‘एसडीएमसी’ सभामें प्रस्तुत होगा, जहां भाजपा बहुमतमें है ।
‘एसडीएमसी’के अध्यक्ष राजदत्त गहलोतने बताया कि इस प्रस्तावका उद्देश्य ग्राहकोंको यह ज्ञात करवाना है कि वे क्या खा रहे हैं ? अभीतक यह समस्या है कि विक्रयका प्रमाणपत्र किसी और वस्तुके लिए होता है तथा विक्रय कुछ अन्य ही किया जाता है ।
‘क्रिसमस’से पूर्व ईसाई समुदायने हलाल मांसके बहिष्कारका निर्णय लिया है । ‘क्रिस्चियन एसोसिएशन’ने (सीएएसए) ईसाइयोंसे कहा है कि वे ‘हलाल’ मांसका बहिष्कार करें !
किसी भी भोज्य पदार्थको भले ही वह शाकाहारी हो, ‘हलाल’ तभी समझा जाता है, जब उसके विक्रयसे प्राप्त धनका कुछ भाग ‘जकात’में दिया जाए । ‘जकात’ (अरबी शब्द) वह दान होता है, जो एक मुसलमान किसी निर्धनको अथवा जिहादके उद्देश्यसे देता है, अर्थात जब एक व्यक्ति जो मुसलमान नहीं है, वह हलाल मांस क्रय करता है, तो उसके धनका एक भाग जिहाद हेतु जाएगा । इसे ‘हलालो नॉमिक्स’ अर्थात हलालका अर्थशास्त्र कहते हैं अर्थात आप अपना नाश स्वयं कर रहे हैं ।
दक्षिण देहली नगरपालिक निगमद्वारा पारित यह प्रस्ताव स्वागत योग्य है । जिहाद ही आतङ्कवादका जनक है; अतः आतङ्कवादपर रोक लगाने हेतु जिहादपर रोक आवश्यक है । देहली ही नहीं; वरन सर्वत्र ऐसे प्रस्ताव लाकर हिन्दू, ईसाई और सिख समाजका धन जिहाद जैसे दुष्कार्यमें न लगे, इसका ध्यान प्रत्येक राज्य शासनको रखना चाहिए । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
स्रोत : ऑप इंडिया
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