परमार वंशके राजभवनपर काजी इरफान, महबूब और अहमदकी निजी सम्पत्तिका बोर्ड
०६ जनवरी, २०२१
क्या सशक्त पत्थरोंसे बनी ऊंची भीतों और गुम्बदोंसे घिरे किसी एक सहस्र वर्ष प्राचीन राजभवनका कोई भाग किसीकी निजी सम्पत्ति हो सकती है, जिसकी एक भीतको (दीवारको) तोडकर सीमेंट और लोहेका द्वार लगा दिया गया हो और कोई इस ओर ऐसी-वैसी दृष्टिसे न देखे, इसके लिए पुरानी भीतपर (दीवारपर) एक हस्ताक्षर फलक (साइन बोर्ड) टांग दिया गया हो, ‘निजी सम्पत्ति, उदयपुर पैलेस, खसरा नंबर – ८२२, वार्ड नम्बर-१४ ।’
मध्य प्रदेशकी राजधानी भोपालके निकट केवल डेढ सौ किलोमीटर दूर एक पूर्ण और प्राचीन नगर अपने एक सहस्र वर्ष प्राचीन वैभवमें शेष है, जैसे प्राण त्याग रहा है; परन्तु ग्राम पंचायतसे लेकर संसद तककी यात्रा करनेवाले जनताके प्रतिनिधियों और प्रशासनिक पराक्रमियोंने इसे घूरेकी भांति रखकर छोडा है ।
भोले ग्रामवासी हिन्दू किसी परमज्ञानी मौलवीके सन्दर्भसे यहां किसी पीरके प्रकट होनेकी ‘ब्रेकिंग न्यूज’ हाथ जोडकर थमा देते हैं ।
परमार वंशके महाराजा उदयादित्यके राजभवनके एक बन्द द्वारपर टंगा वह ‘साइनबोर्ड’ नूतन इतिहासकी घोषणा कर रहा है, ‘निजी सम्पत्ति, उदयपुर पैलेस, वार्ड नंबर-१४, खसरा नंबर-८२२, काजी सैयद इरफान अली, काजी सैयद महबूब अली, काजी सैयद अहमद अली ।’
डॉ. सुरेश मिश्रने कहा कि पूरे नगरको नूतन ढंगसे सहेजनेकी आवश्यकता है । यहां कई भवन और मन्दिर बचे हुए हैं, जो भारतके शताब्दियों पुराने स्थापत्यका एक अप्रतिम परिचय दे रहे हैं । यदि इन्हें न बचाया गया, तो हमारी आंखोंके सामने यह धूलमें मिल रहा है । अब कोई विदेशी आक्रान्ता यह विनाश नहीं कर रहे, इसके उत्तरदायी हम हैं । पत्थरकी खदानोंने निर्माणके लिए आवश्यक सामग्री प्रचुर मात्रामें उपलब्ध कराई । जनसंख्याका जितना विस्तार है, प्राचीन नगरका उससे अधिक है । एक बडे भागके भवन धीरे-धीरे ढह रहे हैं । भवनका कुछ भाग आज भी ऐसा है, जिसे सहेजा जा सकता है । यह पूरे जनपदमें एकमात्र ऐसा स्थान है, जिसे एक पर्यटन केन्द्रके रूपमें ऐसा विकसित किया जा सकता है कि लोगोंको एक पूरा दिन यहां व्यतीत कर अपने भूतकालमें झांकनेका अवसर मिले । मूल शिव मन्दिरके अतिरिक्त भी और कई पुराने मन्दिर और बावडियां हैं, जो किसी चमत्कारसे ही बचे रह गए हैं । इस्लामी आक्रान्ताओंसे यह नगर अछूता नहीं रहा है । इसके साक्ष्य मन्दिरमें ही दिखाई देते हैं, जहां मूर्तियोंको तोडा गया है । यह आश्चर्यकी बात है कि यह मन्दिर अपने मूल आकारमें बचा रह गया और यह नगर भी । दूर-दूरसे लोग उदयपुर आते हैं । अधिकतर केवल ११वीं शताब्दीके मन्दिरके दर्शन करने आते हैं और वे भी केवल महादेवकी पूजा-अर्चनाके लिए । गर्भगृहसे बाहर आकर वे आश्चर्यसे गर्दन ऊंची करके मन्दिरके स्थापत्यको देखते हैं और उसके चित्र लेते हैं । कोई- कोई ही पत्थरोंपर उकेरे इस चमत्कारके विस्तारके विषयमें जाना चाहता होगा । उन्हें इतिहासमें कोई रुचि नहीं है ।
जिहादियोंने हमारे पुरातन पूजास्थल एवं प्रचीन स्मारकोंको ध्वस्तकर उन्हे अपनी ‘मजारों’ या मस्जिदके रूपमें परिवर्तित कर दिया है । हिन्दू बहुसङ्ख्यक समुदाय होकर भी जिहादियोंके इन कुकृत्यपर किसी भी प्रकारका विरोध न करना एक प्रकारसे हमारी दुर्बलता ही है । न शासन सचेत है और न ही हिन्दू, तभी तो एक महान धरोहर प्राण त्याग रही है । ऐसा नहीं है कि यह एकमात्र उदाहरण है, अन्य भी ऐसी भवन हैं, जिनके विषयमें कोई बात ही नहीं करना चाहता है । नेताओंको अपनी ‘कुर्सी’से मोह है, इसलिए वे इन सबपर ध्यान ही नहीं देते; परन्तु अपनी धरोहरको लेकर हिन्दुओंको भी चिन्ता नहीं, यह तो लज्जाजनक है । हिन्दुओ, समयसे पूर्व जाग जाओ ! – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
स्रोत : ऑप इंडिया
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