लेखक जॉय भट्टाचार्यने स्वामी विवेकानन्दके नामपर उगला हिन्दू विरोधी विष


१३ जनवरी, २०२१
      स्वामी विवेकानन्दने युवाओंको एक सन्देश दिया था कि ‘गीता पढनेसे अच्छा है कि ‘फुटबॉल’ खेलो’ । स्वामीजीका युवाओंसे किया गया यह एक विशेष आह्वान विवाद और चर्चाका विषय रहता है । वामपन्थी बुद्धिपिशाच उनके इस वक्तव्यको अपना ध्येय साधनेके उद्देश्यसे करते आए हैं, जबकि कुछ सनातनी भी प्रायः इसके भ्रममें पडकर भडक उठते हैं, बिना ये समझे कि वास्तवमें स्वामी विवेकानन्दके वक्तव्यके निहितार्थ क्या थे ?
     स्वामी विवेकानन्दके इस वक्तव्यको तोड-मरोडकर सामने रखने और अपने उद्देश्योंको पूरा करनेका यह प्रयास इस बार लेखक जॉय भट्टाचार्यद्वारा किया गया है । जॉय भट्टाचार्यने स्वामी विवेकानन्दके जन्मदिनपर उनके इस कथनको उल्लेखित करते हुए अपने ‘ट्विटर’ खातेपर लिखा, “आप गीताके अध्ययनकी तुलनामें ‘फुटबॉल’के माध्यमसे स्वर्गके अधिक निकट होंगे । स्वामी विवेकानन्द, आजके दिन १८६३ में जन्मे थे । उन्होंने १८८० में टाउन क्लबका प्रतिनिधित्व करते हुए एक बार ७ विकेट भी लिए थे । संयोगसे, कालान्तरमें टाउन क्लबसे निकला हुआ कोई खिलाडी, जिसने सफलता प्राप्त की, वह मोहम्मद शमी है ।”
     निश्चित ही, जॉय भट्टाचार्यका उद्देश्य यहांपर न ही गीताका महिमामण्डन था न स्वामी विवेकानन्दका स्मरण करना ही था । जॉयका संकेत स्वामी विवेकानन्दके कथनको धूर्ततासे रखते हुए यह सिद्ध करना था कि गीता पढना एक निकृष्ट कार्य है और ‘फुटबॉल’ उत्तम विकल्प है । यदि आशय इस ओर संकेत न करता तो जॉयको किसी ‘फुटबॉल’रका नाम लिखना चाहिए था, न कि ‘फुटबॉल’का उदाहरण देकर एक मुसलमान खिलाडीका । मोहम्मद शमी भारतके क्रिकेट खिलाडी हैं; परन्तु जॉय भट्टाचार्य क्या हैं, वह भी दिख रहा है ।
   उल्लेखनीय है कि स्वामीजी किसीको गीता फेंकने और मात्र ‘फुटबॉल’ खेलनेके लिए नहीं कह रहे हैं । वह कह रहे हैं कि स्वस्थ शरीर उसी ‘कर्मयोग’की पूर्तिके लिए आवश्यक है, जिसका वर्णन गीतामें भगवान कृष्णने भी दिया ।
    जॉय भट्टाचार्य जैसे लोग सैकडों हैं, जिन्हें स्वामी विवेकानन्दके सभी आदर्शोंमें आपत्ति दिख ही जाती हैं ।
          यदि ‘फुटबॉल’ खेलनेको कहा गया है, तो वह एकाग्रता सिद्ध करने हेतु है और वह क्षणिक एकाग्रता क्षणिक समाधिका अनुभव दे सकती है; परन्तु निर्विकल्प समाधिका नहीं, इसलिए ‘फुटबॉल’ खेलनेके पश्चात उसे भगवद्गीताके पास ही जाना होगा ‌। स्वामीजीने आरम्भिक साधकोंके लिए एकाग्रता सिद्ध करने हेतु यह एक दृष्टिकोण दिया है; परन्तु सन्तोंके वक्तव्योंका अर्थ न समझनेवाले मूढ हिन्दूद्रोही उसे न ही समझ पाते हैं, उल्टा अपने अनुसार परोसकर समाजमें उल्टा अर्थ प्रसारित करते हैं । ऐसे लोगोंका विरोध अत्यन्त आवश्यक है । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ 

स्रोत : ऑप इंडिया



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