पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायालयका नवीन निर्णय, अब युवा होते ही मुसलमान युवती कर सकती हैं मन अनुसार विवाह
१२ फरवरी, २०२१
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालयने इस्लामिक साहित्यका संज्ञान देते हुए एक याचिकापर अपना नवीन निर्णय सुनाया है । जिसके अनुसार मुसलमान युवती किसीसे भी मन अनुसार ‘निकाह’ कर सकती है तथा न्यायालयके अनुसार, न्यायिक रूप से परिवारभी इसमें किसी प्रकारका अवरोध उत्पन्न नहीं कर सकता । न्यायालयमें न्यायाधीश अलका सरीनने यह निर्णय मुसलमान धार्मिक पुस्तकके ‘आर्टिकल’ १९५ के आधारपर सुनाया है । न्यायालयने अपना यह निर्णय ‘सर डी फरदुनजी मुल्ला’की पुस्तक ‘प्रिंसिपल ऑफ मोहम्मडन लॉ’का संज्ञान देते हुए भी दिया है । यह पूरा प्रकरण न्यायालयमें मोहालीके एक मुसलमान नवविवाहित दम्पतिकी याचिका प्रविष्ट करनेके पश्चात आरम्भ हुआ । समाचारके अनुसार, एक ३६ वर्षीय मुसलमान युवकने मात्र १७ वर्षकी युवतीसे प्रेम सम्बन्ध होनेके कारण २१ जनवरीको ‘निकाह’ कर लिया, जिसके पश्चात दोनोंके परिजन रुष्ट हो गए तथा उन्हें धमकियां देने लगे । स्थितिको देखते हुए दोनोंने न्यायालयकी शरण ली व पुलिससे सुरक्षा मांगी । इसी प्रकरणकी सुनवाई करते हुए न्यायाधीशने अब यह निर्णय सुनाया है । न्यायालयने यह भी कहा कि यदि कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, तो एक युवतीकी १५ वर्षकी आयु पूर्ण करनेके पश्चात ‘प्यूबर्टी’ अर्थात यौवन प्राप्त करना माना जाता है । न्यायालयने अपना निर्णय सुनाते हुए पुलिस अधीक्षकको आदेश दिया कि वह मुसलमान दम्पतिको सुरक्षा प्रदान करे ! उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालयने मुसलमान महिलाओं एवं पुरुषोंके सम्बन्ध विच्छेद व विवाहको लेकर विशेष निर्णय दिया था, जिसमें स्पष्ट रूपसे कहा गया था यदि मुसलमान महिलाएं ‘तलाक’के बिना दूसरा विवाह करती है तो वह अवैध माना जाएगा, जबकि पुरुषोंको बिना ‘तलाक’ लिए ही दूसरे विवाह करनेकी अनुमति प्रदान की गई है ।
समाचारके अनुसार, अब लगता है कि वह समय आ गया है जब सम्पूर्ण भारतमें ‘एक राष्ट्र एक विधान’को लागू कर दिया जाए । वहीं न्यायापालिकाको भी किसी समुदायके प्रति विशेष लगाव न दिखाते हुए ऐसे निर्णय देने चाहिए, जो सभी नागरिकोंके लिए एक समान हो व सहायक सिद्ध हो । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
स्रोत : ऑप इंडिया
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