उच्चतम न्यायालयने शाहीनबाग प्रदर्शनपर पुनर्विचार याचिका की निरस्त
१४ फरवरी, २०२१
उच्चतम न्यायालयने शनिवार, १३ फरवरीको शाहीनबागमें ‘सीएए’के विरुद्ध धरनेको लेकर अपने पुराने निर्णयपर विचार करनेसे मना कर दिया । न्यायालयने कहा कि विरोधका अधिकार ‘कभी भी’ और ‘हर जगह’ नहीं हो सकता । १२ कथित सामाजिक कार्यकर्ताओंने उच्चतम न्यायालयसे अक्टूबर २०२० के उस निर्णयपर पुनर्विचारकी याचिका की थी, जिसमें शीर्ष न्यायालयने नागरिकता संशोधन विधेयकके विरुद्ध शाहीनबागके प्रदर्शनोंको अवैध बताया था ।
न्यायालयने कहा कि धरना-प्रदर्शन अपनी स्वयंकी इच्छासे और किसी भी स्थानमें नहीं कर सकते । न्यायालयने कहा कि विरोध प्रकट करनेके लिए धरना प्रदर्शन लोकतन्त्रका अङ्ग है; परन्तु उसकी भी एक सीमा निर्धारित है । इसके साथ ही शीर्ष न्यायालयने गत वर्ष अक्टूबरमें दिए गए निर्णयको यथावत रखा । न्यायालयने पिछले वर्ष अक्टूबरमें निर्णय सुनाया था कि धरना-प्रदर्शनके लिए स्थान चिह्नित होना चाहिए । इस निर्णयमें शीर्ष न्यायालयने नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और ‘राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर’के (एनआरसी) विरोधमें शाहीनबागके प्रदर्शनको असंवैधानिक बताया था । शीर्ष न्यायालयके इस निर्णयको चुनौती देते हुए पुनर्विचार याचिका प्रविष्ट की गई थी । शीर्ष न्यायालयने कनिज फातिमा सहित कार्यकर्ताओंकी ओरसे प्रविष्ट याचिकाके प्रकरणकी सुनवाई न्यायालयमें करनेके अनुरोधको भी अस्वीकार कर दिया । न्यायालयने टिप्पणी की कि संविधान विरोध-प्रदर्शन और असन्तोष व्यक्त करनेका अधिकार देता है; परन्तु कुछ कर्तव्योंकी बाध्यताके साथ । न्यायालयने अपने आदेशमें कहा कि हमने ‘सिविल अपील’में पुनर्विचार याचिका और ‘रिकॉर्ड’पर विचार किया है । हमने उसमें कोई चूक नहीं पाई है । उल्लेखनीय है कि देहलीके शाहीनबागमें नागरिकता संशोधन विधानके विरुद्ध लगभग १०० दिनोंतक लोग सडक रोककर बैठे थे । देहलीको नोएडा और फरीदाबादसे जोडनेवाले एक महत्त्वपूर्ण मार्गको रोक दिए जानेसे प्रतिदिन लाखों लोगोंको असुविधा हो रही थी । इतना ही नहीं, देहलीमें हुए हिन्दू विरोधी उपद्रवका षड्यन्त्र भी शाहीन बागमें ही रचा गया था ।
शीर्ष न्यायालयका यह निर्णय देशवासियोंके लिए सन्तोष प्रदान करनेवाला है; परन्तु देश उस दिवस सुरक्षित एवं निर्भय होगा जब इन जिहादियोंको देशद्रोहके अपराधमें कठोरसे कठोर दण्ड दिया जाएगा । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
स्रोत : ऑप इंडिया
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