कुछ व्यक्तिसे जब पूछते हैं कि आपको उपासनाके कार्यक्रमकी सूचना दी गई थी तो भी आप सेवा हेतु नहीं आए तो वे बताते हैं कि वे फलां-फलां समाजसेवामें व्यस्त थे ! एक बातका सभी साधक ध्यान रखें कि आनेवाले अगले चार-पांच वर्ष सभीके लिए बहुत भारी होंगे; क्योंकि जो विनाश, युद्ध एवं प्राकृतिक आपदाओंके कारण होगी, वह समष्टि पापके कारण होगा; अतः इससे कोई भी अछूता नहीं रहेगा | आपात स्थितिमें ईश्वर ही सबके रक्षक होंगे | समाजसेवासे पुण्य मिलेगा, आपका रक्षण नहीं होगा; क्योंकि ईश्वर भक्तवत्सल होते हैं, पुण्यवानवत्सल नहीं ! अतः आपात स्थिति आनेपर ईश्वर आपकी किसी भी रूपमें सहायता करें इस हेतु समय रहते भक्त बनें | दूसरा एक महत्त्वपूर्ण तथ्य ध्यान रखें, जो स्वार्थी है उसने भावनामें आकर निर्धनोंको धन देना, धर्मशाला, पाठशाला, कुंआ, बावडी या तालाब या मंदिर बनवाना चाहिए या अन्य प्रकारकी सेवा करनी चाहिए; किन्तु जो समाजसेवा कर रहे हैं और साधना आरम्भ कर चुके हैं उन्होंने भावनामें बहकर कार्य करना छोडकर, सन्तोंके कार्यमें यथाशक्ति सहयोग देना चाहिए; क्योंकि भावनावश किया जानेवाला सभी अच्छा कर्म पुण्य देता है और साधकके लिए यदि पाप जो बुरे कर्मका प्रतिफल होता है, वह लोहेकी बेडियां है तो पुण्य सोनेकी बेडियां होती हैं अर्थात दोनों ही ईश्वरप्राप्तिमें अवरोधक ही होते हैं, इन्हें भोगे बिना ईश्वरप्राप्ति असंभव है; अतः शास्त्र जान लेनेके पश्चात, सेवा नहीं सत्सेवा करें अर्थात सन्तोंके मार्गदर्शनमें सेवा करें, इससे आपके संचित जलेंगे और आध्यात्मिक प्रगति भी होगी !
Leave a Reply