गीता सार


कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ।
लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ॥ – श्रीमदभगवद्गीता ३:२०
अर्थ : जनकादि ज्ञानीजन भी आसक्ति रहित कर्मद्वारा ही परम सिद्धिको प्राप्त हुए थे, इसलिए तथा लोकसंग्रहको देखते हुए भी तू कर्म करनेके ही योग्य है अर्थात तुझे कर्म करना ही उचित है |
भावार्थ : कर्मका आसक्तिरहित होना अति आवश्यक है तभी वह अकर्म-कर्म बनता है | राजा जनक यद्यपि राजा थे परंतु अपनी साधनाके बलसे वे अनासक्त होकर प्रत्येक कर्म करते थे अतः वे नृप होते हुए भी वर्णसे ब्राह्मण हो गए और उन्हें सदेह मुक्ति मिली और उन्होंने अपना कल्याण सिद्ध कर लिया | भगवान श्रीकृष्ण अर्जुनसे कहते हैं युद्धके समय नेतृत्व करनेका समय है न की युद्धसे पलायन करनेका और यही योग्य कर्म है | जब काल विपरीत हो तब व्यष्टि हितकी अपेक्षा समष्टि हितका विचार कर उस समय जो भी योग्य लगे उसे अनासक्त होकर करना ही कर्मयोग है और इसीमें सभीका कल्याण निहित है|

-तनुजा ठाकुर

 



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