गीता सार


वासांसि जीर्णानि यथा विहाय

नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ श्रीमद भगवदगीता – (२:२२ )

अर्थ : जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रोंको त्यागकर दूसरे नए वस्त्रोंको ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा, जीर्ण शरीरोंको त्यागकर दूसरे नए शरीरोंको प्राप्त होती है |
भावार्थ : मनुष्यका यह शरीर नश्वर है और आत्मा अविनाशी है | वास्तविकता यह है कि जीर्ण शरीर, जो साधनाके योग्य नहीं रह पाता, उसका नाश होना एक प्रकारसे ईश्वरीय वरदान है और पुनः नए वस्त्र-समान नया शरीर लेकर जन्म लेना, साधना हेतु एक उत्तम माध्यम है | पुराने वस्त्रका त्याग जैसे हम स्वाभाविक ही कर देते हैं और हमें उसका मोह नहीं होता, उसी प्रकारसे किसीकी मृत्युका भी शोक करना उचित नहीं क्योंकि यह उस जीवात्माकी आध्यात्मिक प्रगतिके लिए सृष्टिद्वारा रचित एक प्रक्रिया है | अतः ज्ञानी मृत्युपर शोक नहीं करते, क्योंकि शरीरमें स्थित आत्मा अविनाशी है और जब तक जीवात्माकी मन, बुद्धि, वासना और अहमका अंश रहता है, तब तक उसे ‘पुनर्पि जन्मम पुनर्पि मरणम’ के चक्रमें बंधे रहना पड़ता है | इस चक्रसे छुटकारा पाने हेतु साधना करनेकी आवश्यकता होती है |

-तनुजा ठाकुर



Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

सम्बन्धित लेख


विडियो

© 2021. Vedic Upasna. All rights reserved. Origin IT Solution