कभी कोई पुलिस अधिकारी तो कभी प्राध्यापक तो कभी कोई सामाजिक कार्यकर्ता मात्र पारिवारिक कलहके कारण आत्महत्या कर लेते हैं !, इससे ही आजकी शिक्षण पद्धति कितनी दोषपूर्ण है यह समझमें आता है ! ये सभी समाजमें प्रतिष्ठित व्यक्ति होते हैं और कुछके तो अनुयायी भी होते हैं ! जो व्यक्ति सामान्य समस्याओंसे जूझनेके स्थानपर अपना बहुमूल्य जीवन क्रोध या अवसादके वेगमें नष्ट कर लेता है, वह बुद्धिजीवी कहलानेका अधिकारी होता है क्या ? जो अपनी समस्याओंका समाधान नहीं कर सकता है, वह दूसरोंकी समस्याओंको कैसे सुलझा सकता है, उसे दिशा कैसे दे सकता है ? इसे व्यक्ति समाजके दर्श कैसे हो सकते हैं ?
आत्महत्या करना पाप है, यह ईश्वरीय नियोजनमें हस्तक्षेप है, यह यदि पाठ्यक्रमोंमें सिखाया जाता तो आज बुद्धिजीवियोंमें इतनी कुंठा नहीं होती ! मात्र धर्म और साधना ही विपरीत परिस्थियोंमें व्यक्तिको मानसिक संतुलन बनाए रखनेकी शक्ति देता है; इसलिए हिन्दू राष्ट्रमें बाल्यकालके ही पाठ्यक्रमोंसे धर्म, अध्यात्म और साधनाका महत्त्व सिखाया जायेगा !
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