उच्च न्यायालयके आदेशको ठेंगा दिखा अफजल खानकी अवैध ‘कब्र’को बचानेमें लगा है महाराष्ट्र शासन, वन विभागकी भूमिपर कर रखा है आधिपत्य


२७ मई, २०२२
      जिस अफजल खानको हमारे छत्रपति शिवाजी महाराजने मार डाला था । उसका ‘मकबरा’ है और विशेष समुदायके लोगोंद्वारा उसकी ‘कब्र’पर पुष्पोंकी माला अर्पित की जा रही है । इस प्रकरणपर महाराष्ट्र शासन शान्त बैठा है ।
      इतिहासकी पुस्तकोंमें यह प्रकरण प्रायः पढनेमें आता है कि कैसे शिवाजी महाराजने अफजल खानको मारा था ? यह घटना १० नवम्बर १६५९ की है । यह वह ‘दौर’ था जब छत्रपति शिवाजीकी विजय पताका ‘जोरों-शोरों’से लहरा रही थी । ऐसेमें जब मुगल आक्रान्ता शिवाजीको सामनेसे ‘मात’ नहीं दे पाए तो बीजापुरके शासक अफजल खानने उन्हें छलसे मारनेकी योजना बनाई । उसने शिवाजीको महाराष्ट्रमें महाबलेश्वरके निकट प्रतापगढके दुर्गपर मिलनेके लिए बुलाया । उसने आगे बढकर शिवाजीको गले लगाया और पीछेसे उनकी पीठपर ‘खंजर’ घोंपनेका प्रयास किया । यद्यपि, उसकी कुटिलतासे परचित शिवाजीने एक ‘खंजर’से उसके ही उदरको चीर दिया ।
      उस समय शिवाजीकी आयु मात्र १९ वर्ष की ही थी; किन्तु उनके समक्ष अफजल खानकी एक न चली । शिवाजीके प्रहार करते ही वह चीखते हुए भूमिपर ढेर हो गया । कुछ समय उपरान्त अफजल खानकी मृत्युके उपरान्त सम्मान रखते हुए उसे उसी स्थानपर ‘दफनाया’ गया और उसके ऊपर समाधिके रूपमें पाषाण रख दिया गया ।
      दो दशक पहलेतक आक्रान्ता अफजल खानकी ‘कब्र’ जीर्ण-शीर्ण अवस्थामें थी, इसपर किसीका कोई ध्यान नहीं था । प्रतापगढ दुर्गके प्रवेश द्वारसे भीतर जाते ही कुछ सीढिया चढनेपर दाहिनी ओर इसकी ‘कब्र’को देखा जा सकता है । यद्यपि, यह चर्चामें वर्ष २००० में उस समय आया, जब कुछ मुसलमानोंने इस ‘कब्र’पर ‘दावा’ करते हुए वहांपर एक आश्रय स्थल (शेल्टर) बनानेका निर्णय किया । अपुष्ट जानकारियोंके अनुसार, लगभग एक दशक पूर्व राज्यके वन विभागने ‘दरगाह’ न्यासको ‘कब्र’के आसपास भूमिका आवंटनकर दिया, जिससे वह वहांपर निर्माण कर सकें ।
      सत्ताके लिए के कोई कितना गिर सकता है ?, वह शव (शिव) सेनाके चरित्रसे ज्ञात होता है । हिन्दू हृदयसम्राट बाला साहब ठाकरेकी आत्मा भी अपने कपूतके कृत्योंसे रोती होगी । जिहादी षड्यन्त्रके अन्तर्गत चोरी छुपे भूमि जिहादके माध्यमसे शासकीय भूमिपर आधिपत्य करके विवाद उत्पन्न कर रहे हैं । शान्ति बनाए रखने और बलात आधिपत्य न हो पाए इसके सतर्कताकी कितनी आवश्यकता है, वह इस प्रकरणसे ज्ञात होता है । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
 
 
स्रोत : ऑप इंडिया


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