जनवरी ५, २०१९
तमिलनाडुमें सत्तारूढ अन्नाद्रमुकने मंगलवार, ५ फरवरीको द्रमुक अध्यक्ष एम.के.स्टालिनकी आलोचना करते हुए उनपर राज्यके लोगोंको धार्मिक आधारपर विभाजित करनेका प्रयास करनेका आरोप लगाया । पार्टीने स्टालिनपर कटाक्ष सामाजिक प्रसार माध्यमपर दो वर्ष पुराना एक वीडियो सन्देश सामने आनेके पश्चात किया, जिसमें कथित रूपसे वह विवाहके वैदिक अनुष्ठानोंकी आलोचना कर रहे हैं । स्टालिनका नाम लिए बिना सत्तारूढ पार्टीने उन्हें लक्ष्य बनाते हुए कहा कि द्रमुक प्रमुखने अल्पसंख्यक समुदायके एक कार्यक्रममें भाग लेकर ‘‘हिन्दू रीति-रिवाजों और विशेष रूपसे वेदका पाठ करनेवाले ब्राह्मणोंका अपमान किया है ।’’ सामाजिक प्रसार माध्यमपर गत सप्ताह दिखे १.२८ मिनटके वीडियोमें स्टालिनने कथित रूपसे ‘वैदिका’की आलोचना की । वैदिकाके अन्तर्गत ब्राह्मण पुरोहित हिन्दू विवाह सम्पन्न कराते हैं । वीडियोमें स्टालिन कहते दिख रहे हैं, ‘‘यज्ञसे (हवन) निकलनेवाले धुएंसे न केवल दुल्हन और दूल्हा, वरन समारोहको देख रहे आस-पासमें लोगोंकी नेत्रोंसे भी अश्रु छलक पडते हैं और दुःखका वातावरण बन जाता है ।’’ स्टालिन वीडियो सन्देशमें कथित रूपसे कह रहे हैं, ‘‘संस्कृतके श्लोकोंको पुरोहित सहित कोई भी नहीं समझ सकता है और इसका ‘निहितार्थ’ ‘घृणित’ है ।’’ उन्होंने कहा कि दूल्हा और दुल्हन कुर्सीपर नहीं बैठ सकते और उन्हें भूमिपर बैठना पडता है । वीडियो सन्देशको लेकर लोगोंका आक्रोश दिखा । कई उपयोक्ताओंने स्टालिनपर इसके लिए कटाक्ष किया । अन्नाद्रमुकके मुखपत्र ‘नामाधु पुरात्ची थलाइवी अम्मा’में ‘अहंकारी भाषण’ शीर्षकसे लेखमें स्टालिनके व्यंग-चित्रके साथ इस बातपर आश्चर्य प्रकट किया कि हिन्दू आस्थाओंका क्यों उपहास उडाया जाए ?’’ प्रसिद्ध तमिल कवि और स्वतन्त्रता सेनानी ‘नामक्कल कविगनार’ वी रामलिंगम पिल्लईके छन्दोंको उद्धृत करते हुए कहा कि बिना सोचे-समझे दिया गया वक्तव्य केवल घृणाको स्थान देता है । हिन्दू मुन्नानीके संस्थापक राम गोपालनने मांग की कि स्टालिन अपने वक्तव्यके लिए क्षमा मांगें । उन्होंने कहा कि किसी राजनीतिक दलको सबके प्रति समान भाव रखना चाहिए और सभी समुदायका सम्मान करना चाहिए । स्टालिनके भाषणको किसीका अपमान करनेवाला होनेके दावोंको नकारते करते हुए अन्नाद्रमुकके एक प्रवक्ताने ‘पीटीआई-भाषा’से कहा कि अनुष्ठानके बिना विवाह, पार्टीकी विचारधाराकी आधारशिला रहा है ।
“नास्तिक करूणानिधिके पुत्र, स्टालिन सदृश निधर्मी लोगोंसे विज्ञान, तर्क व धर्महितकी बातोंकी अपेक्षा भी कैसे की जा सकती है ? ये लोग उन स्वघोषित पन्थोंसे भिन्न नहीं हैं, जो वैदिक होनेका दावा करते हैं और वेदके नामपर कुतर्ककर हिन्दुत्त्व व इसकी वैज्ञानिक परम्पराओंको चुनौती देते हैं । यज्ञका पवित्र धुंआ गौघृतके कारण प्राणवायु उत्पन्न करता है, जो भिन्न-भिन्न जडी-बूटियों जैसे जौ, गिलोय, कर्पूर, सुपारी आदिके स्वाहा होनेपर वह प्राणवायु औषधिय गुणोंसे सम्पन्न हो जाती है, जो शरीरके विभिन्न रोगोंके साथ वातावरणके विषाणुओंका भी नाश करती है और उस पवित्र अग्निको साक्षी मान वर-वधू एक पवित्र बन्धनमें बंधते हैं, जो पवित्रता न ईसाईयोंमें है और न ही इस्लाममें । यह सरलसा विज्ञान या तो मैकॉले शिक्षितोंको या मूर्खों इन दो वर्गोंके लोगोंको ही समझमें नहीं आ सकता है । अब ये लोग स्वयं ही अपना वर्ग निर्धारित कर लें और संस्कृतकी महानताको तो आज सभी देश मान रहे हैं, वैज्ञानिक तक संस्कृतका लोहा मान चुके हैं; परन्तु इन्हें उसका निहितार्थ घृणित लगता है; क्योंकि न ही इन्हें संस्कृत आती है और न ही उसके संस्कार मिले हैं तो इसमें संस्कृतका नहीं, इनकी बुद्धिका दोष है ! स्मरण हो कि करूणानिधिकी मरणोपरान्त स्थितिमें इन्हीं नास्तिकोंने उसी यज्ञ और इन्हीं संस्कृत मन्त्रोंका आश्रय लिया था ! धर्मराज्यकी स्थापनासे पूर्व ऐसे निधर्मियोंसे राष्ट्रका शुद्धिकरण आवश्यक है !”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : नभाटा
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