आइये शास्त्रानुसार मनाएं हिन्दू नव वर्ष !


इस लेखको सभी ध्यानपूर्वक पढ़कर उसी पद्धतिसे इस बार नव वर्ष मनानेका प्रयास करें !
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा ही वर्षारंभ :इस बार यह आज २८ मार्च २०१७  को है !

त्यौहार मनानेकी पद्धति

अभ्यंगस्नान (मांगलिक स्नान): इस दिन प्रात: जल्दी उठकर प्रथम अभ्यंगस्नान करते हैं । अभ्यंगस्नान अर्थात् शरीरको तेल लगाकर, मालिश कर, उसे त्वचामें सोखकर तदुपरांत गुनगुने जलसे स्नान करना । स्नानके कारण रज-तम गुण एक लक्षांश कम होते हैं व सत्त्वगुण उसी मात्रामें बढता है । नित्यके स्नानके कारण उनका प्रभाव लगभग तीन घंटे टिकता है, जबकि अभ्यंगस्नानके कारण चारसे पांच घंटे टिकता है ।

देशकालकथनका महत्त्व: अभ्यंगस्नान करते समय देशकालकथन करना पडता है ।

ब्रह्मदेवके जन्मसे लेकर अबतक ब्रह्मदेवके कितने वर्ष हो गए, किस वर्षका कौनसा व कितना मन्वंतर चल रहा है, इस मन्वंतरको कितने महायुग व उस महायुगका कौनसा उपयुग चल रहा है, इन सबका उसमें उल्लेख रहता है । इस प्रकार देशकालकथन करना होता है ।

बंदनवार लगाना: स्नानोपरांत आम्रपल्लवोंका बंदनवार तैयार कर, लाल पुष्पोंके साथ प्रत्येक द्वारपर बांधते हैं; क्योंकि लाल रंग शुभदर्शक है ।

संवत्सर पूजा: प्रथम नित्यकर्म देवपूजा करते हैं । `वर्ष प्रतिपदाके दिन महाशांति करते हैं । शांतिके प्रारंभमें ब्रह्मदेवकी पूजा करते हैं; क्योंकि इस दिन ब्रह्मदेवने विश्वकी निर्मिति की थी । पूजामें उन्हें दौना (कटावदार तेज सुगंधवाला पत्ता) चढाते हैं । तदुपरांत होमहवन व ब्राह्मणसंतर्पण करते हैं । तदुपरांत अनंत रूपोंमें अवतरित विष्णुकी पूजा करते हैं । `नमस्ते ब्रह्मरुपाय विष्णवे नम: ।’, इस मंत्रका उच्चारण कर उन्हें नमस्कार करते हैं व तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको दक्षिणा देते हैं । संभव हो, तो इतिहास, पुराण इत्यादि ग्रंथ ब्राह्मणको दान देते हैं । यह शांति करनेसे सर्व पापोंका नाश होता है, दुर्घटना नहीं होती, आयु बढती है व धन-धान्यकी समृद्धि होती है, ऐसे कहा गया है ।

ध्वजा खडी करना

ध्वजाके अन्य नाम: ब्रह्मदेवने इस दिन सृष्टिनिर्मिति की, इसलिए धर्मशास्त्रमें इस ध्वजको `ब्रह्मध्वज’ कहा गया है । इसे कुछ लोग `इंद्रध्वजके’ नामसे भी संबोधित करते हैं ।

पद्धति: लंबी बांसके ऊंचे सिरेपर हरी या पीली जरीवाली चोलीका वस्त्र बांधते हैं । उसपर शक्करके पदक ( बताशे) , नीमकी कोमल पत्तियां, आमकी डाली व लाल पुष्पोंका हार बांधकर उसपर चांदी व तांबेका कलश सजाकर ध्वजा उभारी जाती है । उसके सम्मुख सुंदर रंगोली बनाई जाती है । नूतन वर्षके स्वागत हेतु प्रत्येक व्यक्ति उत्सुक होता है । ब्रह्मध्वजाय नम: । बोलकर इस ध्वजाकी संकल्पपूर्वक पूजा की जाती है । सूर्यास्तके समय गुडका नैवेद्य दिखाकर ध्वजा उतारते हैं ।

लाभ: ध्वजाके कारण वातावरणसे प्रजापति-संयुक्त तरंगें इस कलशरूपी सूत्रकी सहायतासे घरमें प्रवेश करती हैं । (दूरदर्शनका ऐंटेना जैसे कार्य करता है, उसी प्रकार यह है ।) अगले दिनसे इस कलशसे जल पीएं । प्रजापति तरंगोंसे संस्कारित कलश पीनेके जलपर उसी प्रकारके संस्कार करता है । अतएव हमें प्रजापति तरंगें वर्षभर प्राप्त होती हैं।

पंचांगश्रवणका लाभ: ज्योतिषका पूजन कर उससे या उपाध्यायसे नए वर्षका पंचांग अर्थात् वर्षफल श्रवण करते हैं । तिथिके श्रवणसे लक्ष्मी प्राप्त होती है, वारोंके श्रवणसे आयु बढती है, नक्षत्रश्रवणसे पापोंका नाश होता है, योगश्रवणसे रोग दूर होता है, करणश्रवणसे निर्धारित कार्य साध्य होते हैं । ऐसा उत्तम फल है इस पंचांगश्रवणका । इसके नित्य श्रवणसे गंगास्नानका फल मिलता है ।

नीमकी पत्तियोंका प्रसाद

महत्त्व: अन्य किसी भी पदार्थकी अपेक्षा नीममें प्रजापति तरंगें ग्रहण करनेकी क्षमता अधिक होनेके कारण उस दिन नीमका प्रसाद खाया जाता है । कुछ पदार्थोंकी तरंगें ग्रहण करनेकी क्षमता आगेकी सारिणीमें दी गई है । इससे स्पष्ट होगा कि, संवत्सरारंभके दिन नीम क्यों खाते हैं और दूध, दही, घी, शक्कर, ये पदार्थ चैत्र महीनेमें क्यों नहीं खाते ।

कृति: मंत्रके आवर्त्तन करते हुए नीमके पुष्प, कोमल पत्ते, चनेकी भीगी दाल या भिगोए गए चने, शहद, जीरा व थोडीसी हींग एक साथ मिलाकर प्रसाद तैयार करें व सभीको बांटें ।

शुभकामनापत्र: हम दीपावलीपर अथवा जनवरीमें नववर्षके शुभकामनापत्र अपने रिश्तेदार व मित्रोंको भेजते हैं । उसकी अपेक्षा शुभकामनापत्र चैत्र शुक्ल प्रतिपदापर भेजना प्रारंभ करें, क्योंकि यह खरा वर्षारंभ दिन है ।
सन्दर्भ : परम पूज्य डॉ. जयंत आठवले द्वारा संकल्ति ग्रन्थ  व्रत त्यौहार एवं धार्मिक उत्सव से उधृत



One response to “आइये शास्त्रानुसार मनाएं हिन्दू नव वर्ष !”

  1. Ramesh L. Padhiar says:

    क्या सगाईमें “रींग सेरेमनी” हिंदू प्रथा हैं ? कृपया मुझे समझाएँ। और नहीं है तो उसका विरोध करता हुआ लेख प्रसिद्ध किजीए।

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