वीणावादिनी मां सरस्वतीका करें पूजन*
माघ माहके शुक्ल पक्षकी पंचमीसे ऋतुओंके राजा वसंतका आरम्भ हो जाता है । यह दिन नवीन ऋतुके आगमनका सूचक है; इसीलिए इसे ऋतुराज वसंतके आगमनका प्रथम दिन माना जाता है । इसी समयसे प्रकृतिके सौंदर्यमें निखार दिखने लगता है । वृक्षोंके पुराने पत्ते झड जाते हैं और उनमें नए-नए गुलाबी रंगके पल्लव मनको मुग्ध करते हैं ।
*वसंत पंचमीका पूजन*
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥
अर्थ – जो विद्याकी देवी भगवती सरस्वती कुन्दके पुष्प, चंद्रमा, हिमराशि और मोतीके हारकी भांति धवल वर्णकी है और जो श्वेत वस्त्र धारण करती हैं, जिनके हाथमें वीणा-दण्ड शोभायमान है, जिन्होंने श्वेत कमलोंपर आसन ग्रहण किया है तथा ब्रह्मा विष्णु एवं शंकर आदि देवताओंद्वारा जो सदा पूजित हैं, वही सम्पूर्ण जडता और अज्ञानको दूर कर देनेवाली सरस्वती हमारी रक्षा करें ।
१. स्नान आदि करके पीतांबर या पीले वस्त्र पहनें ।
२. माघ शुक्ल पूर्वविद्धा पंचमीको उत्तम वेदीपर वस्त्र बिछाकर अक्षतसे (चावलसे) अष्टदल कमल बनाएं ।
३. उसके अग्रभागमें गणेशजी स्थापित करें ।
४. पृष्ठभागमें ‘वसंत’ स्थापित करें । वसंत, जौ व गेहूंकी बालीके पुंजको जलसे भरे कलशमें डंठल सहित रखकर बनाया जाता है ।
५. इसके पश्चात सर्वप्रथम गणेशजीका पूजन करें और फिर पृष्ठभागमें स्थापित वसंत पुंजकेद्वारा रति और कामदेवका पूजन करें । इसके लिए पुंजपर अबीर आदिके पुष्पों माध्यमसे छींटे लगाकर वसंत सदृश बनाएं ।
६. सामान्य हवन करनेके पश्चात केशर या हल्दी मिश्रित हलवेकी आहुतियां दें ।
७. ‘वसंत-पंचमी’के दिन किसान लोग नए अन्नमें गुड तथा घी मिश्रित करके अग्नि तथा पितृ-तर्पण करें ।
८. वसंत पंचमीके दिन विद्याकी देवी सरस्वतीके पूजनका भी विधान है । कलशकी स्थापना करके गणेश, सूर्य, विष्णु तथा महादेवकी पूजा करनेके पश्चात वीणावादिनी मां सरस्वतीका पूजन करना चाहिए ।
९. इस दिन विष्णु-पूजनका भी महात्म्य है ।
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