संतोंके सुवचनका मनन चिंतन कर उसे वैयक्तिक जीवनमें और सामाजिक जीवनमें कृतिमें लानेके स्थानपर आजके बुद्धि जीवी उनकी निंदा करते हैं या अपने संकुचित बुद्धिका परिचय देते हुए उसके विषयमें नकारात्मक दृष्टिकोण देनेको ज्ञान कहते हैं ! खरे अर्थमें इसे intellectual bankruptcy अर्थात् बुद्धि भ्रष्टता कहते हैं ! -तनुजा ठाकुर
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