भजगोविन्दं


1150898_10151651623518843_1752593211_n

भजगोविन्दं भजगोविन्दं
गोविन्दं भज मूढमते ।
संप्राप्ते सन्निहिते काले
नहि नहि रक्षति डुकृञ्करणे ॥ १ ॥
अर्थ : गोविन्दकी आराधना कर, गोविन्दकी आराधना कर, गोविन्दकी आराधना कर, रे मूढ ! व्याकरणके नियम मृत्युके समय तुम्हारे काम नहीं आयेंगे।
मूढ जहीहि धनागमतृष्णां
कुरु सद्बुद्धिं मनसि वितृष्णाम् ।
यल्लभसे निजकर्मोपात्तं
वित्तं तेन विनोदय चित्तम् ॥ २ ॥
अर्थ : रे मूढ ! अपने धन एकत्रित करनेकी पिपासाका त्याग कर, अपने मनको सत्यके विचारोंमें लगा । जो कुछ भी आपको अतीतमें किये गए कर्मोंसे प्राप्त हुआ हो उससे संतुष्ट रहें।
नारीस्तनभर नाभीदेशं
दृष्ट्वा मागामोहावेशम् ।
एतन्मांसावसादि विकारं
मनसि विचिन्तय वारं वारम् ॥ ३ ॥
अर्थ : किसी स्त्रीके वक्ष-स्थल और नाभिको देख कर, पशु समान, आवेग और वासनामें बह, मायामें मत डूबो। यह सब कुछ नहीं अपितु हाड़-मांसकी अभिव्यक्ति है। अपने मनको यह बारम्बार समझाना न भूलें।
नलिनीदलगत जलमतितरलं
तद्वज्जीवितमतिशयचपलम् ।
विद्धि व्याध्यभिमानग्रस्तं
लोकं शोकहतं च समस्तम् ॥ ४ ॥
अर्थ : किसी भी व्यक्तिका जीवन उतना ही अनिश्चित है, जितना कि वर्षामें कमलके पत्तोंपर गिरने वाली जलकी बूंदें। ज्ञात रहे कि समस्त संसार व्याधि, अहम् व विषादकी बलि चढता है।
यावद्वित्तोपार्जन सक्तः
स्तावन्निज परिवारो रक्तः ।
पश्चाज्जीवति जर्जर देहे
वार्तां कोऽपि न पृच्छति गेहे ॥ ५ ॥
अर्थ : जब तक व्यक्ति स्वस्थ रहता है और अपने परिवारका संगोपनमें सक्षम होता है, तब तक उसके निकट संबंधी उसके प्रति जो स्नेह दिखाते हैं देखते ही बनता है। जब उसकी देह वृद्धावस्थाके कारण डगमगाने लगती है तब घरमें कोई भी उससे एक शब्द बोलना भी उचित नहीं समझता |
यावत्पवनो निवसति देहे
तावत्पृच्छति कुशलं गेहे ।
गतवति वायौ देहापाये
भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये ॥ ६ ॥
अर्थ : जब कोई व्यक्ति जीवित रहता है, उसके परिवारके सदस्य उसका कुशल-क्षेम पूछते रहते हैं। किन्तु जैसे ही आत्मा देह छोड देती है, उसकी पत्नी भी शवके भयसे भाग जाती है।
बालस्तावत्क्रीडासक्तः
तरुणस्तावत्तरुणीसक्तः ।
वृद्धस्तावच्चिन्तासक्तः
परे ब्रह्मणि कोऽपि न सक्तः ॥ ७ ॥
अर्थ : बाल्यावस्था क्रीडाकी आसक्तिमें निकल जाती है। यौवन स्त्रीमें आसक्तिमें निकल जाता है। वृद्धावास्था विविध विषयोंपर सोचनेमें निकल जाती है। कोई विरला ही होगा जो परब्रह्ममें लीन होना चाहता हो।
काते कान्ता कस्ते पुत्रः
संसारोऽयमतीव विचित्रः ।
कस्य त्वं कः कुत आयातः
तत्त्वं चिन्तय तदिह भ्रातः ॥ ८ ॥
अर्थ : कौन आपकी पत्नी है? कौन आपका पुत्र है? यह संसार भी विचित्र है। आप किसके हैं? आप कहां से आये हैं? भ्राता, इन अवधारणाओंपर चिंतन करें।
सत्सङ्गत्वे निस्सङ्गत्वं
निस्सङ्गत्वे निर्मोहत्वम् ।
निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं
निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः ॥ ९ ॥
अर्थ : सज्जन व्यक्तियोंके सत्संगसे वैराग्य आता है, वैराग्यसे मायासे मुक्ति मिलती है, जिससे स्व-स्थिरता आती है। स्व-स्थिरतासे स्व की आत्मासे मोक्ष मिलता है



Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

सम्बन्धित लेख


विडियो

© 2021. Vedic Upasna. All rights reserved. Origin IT Solution