गीता सार


क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति । कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति || – श्रीमदभगवद्गीता (९:३१)

अर्थ :  वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहनेवाली परम शान्तिको प्राप्त होता है । हे अर्जुन ! तू निश्चयपूर्वक सत्य जान कि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता |

भावार्थ : दुराचारी यदि अनन्य भक्ति करे तो वह अध्यात्मके सर्वोच्च स्थिति परम शांतिको प्राप्त कर सकता है, ऐसे व्यक्तिके पापकर्मोंके कर्मफल साधनाकी अग्निमें जलकर भस्म हो जाता है | सामान्यतः पापीका पाप उसका नाश करता है; किन्तु यहां भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं, कि उनके अनन्य भक्तोंका कभी नाश नहीं होता अर्थात् दुर्जन भी यदि भक्ति करे तो वह नाशसे बच सकता है और परमशांतिकी अनुभूति ले सकता है | इससे ही भक्ति और भक्तका महत्त्व समझमें आता है |

-तनुजा ठाकुर



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