एक कहावत है, ‘चार दिनकी चांदनी, पुनः वही अंधेरी रात’ ! हम भारतीयोंका राष्ट्र प्रेम इस कहावतको चरितार्थ करता है ! मात्र स्वतन्त्रता दिवस और गणतन्त्र दिवसपर हमारा राष्ट्र प्रेम उद्वेलित होता है, शेष दिन हम सब राष्ट्रको खोखला करनेके लिए प्रयत्नरत रहते हैं ! कोई भ्रष्टाचार करता है, तो कोई उसका मूक रूपसे सहमतिदार होता है ! कोई ‘कर’की चोरी करता है तो कोई सार्वजनिक धनको अपनी सम्पत्ति समझ विदेशी बैंकमें जमा करता है, यहां तक कि कार्यालयमें जिस कार्यका हमें वेतन मिलता है, उसे भी हम भारतीय निष्ठासे नहीं कर पाते हैं ! तभी तो स्वतन्त्रताके इतने वर्षोंके पश्चात भी अधिकांश भारतीय भ्रष्ट हैं, यह सर्वेक्षणमें पाया गया हैं । इस स्थितिको परिवर्तित करने हेतु हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना एकमात्र पर्याय है ।
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