बुद्धिप्रामाण्यवादियोंको ऐसा अहंकार होता है कि उन्हें सब ज्ञात है; इसलिए उन्हें कुछ भी जाननेकी जिज्ञासा न होनेसे बुद्धि-अगम्य अध्यात्मशास्त्रका, उन्हें मूलत: ज्ञान नहीं होता, तथापि वे अध्यात्मके अधिकारी, सन्तोंपर टिप्पणी (टीका या आलोचना) करते हैं । – परात्पर गुरु डॉ. जयन्त आठवले, संस्थापक सनातन संस्था
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