विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥ अर्थ : कब मैं श्री गंगाजीके कछारकुंजमें निवास करता हुआ, निष्कपटी होकर सिरपर अंजलि धारण किए हुए चंचल नेत्रोंवाली ललनाओंमें परम सुंदरी पार्वतीजीके मस्तकमें अंकित शिवमंत्र उच्चारण करते हुए परम सुखको प्राप्त करूंगा ?
जय जय देवि चराचरसारे कुचयुगशोभित मुक्ताहारे । वीणापुस्तकरंजितहस्ते भगवति भारति देवि नमस्ते |।। अर्थ : उन देवी सरस्वतीको वंदन है जो चराचरका सार है, जिनका गलेमें मोतियोंके हार सुशोभित है, जिन्होंने वीणा और वेद धारण कर रखा है और जिन्हें भगवती और भारती भी कहते हैं ।
ध्यायेत् पद्मासनस्थां विकसितवदनां पद्मपत्रायताक्षीं हेमाभां पीतवस्त्रां करकलितलसद्धेमपद्मां वराङ्गीम् । सर्वालङ्कारयुक्तां सततमभयदां भक्तनम्रां भवानीं श्रीविद्यां शान्तमूर्तिं सकलसुरनुतां सर्वसम्पत्प्रदात्रीम् ।। अर्थ : उन देवीका ध्यान करें जो कमलपर विराजित हैं, उनका स्वरूप प्रियदर्शिनी है और वर्ण स्वर्ण समान है, उन्होने पीले रंगके वस्त्र धारण किए हैं, उनके सुंदर नेत्र कमलकी पंखुड़ीकी आकृति समान है । वे […]
नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांग रागाय महेश्वराय । नित्याय शुद्धाय दिगंबराय तस्मै “न” काराय नमः शिवायः ।। अर्थ : हे महेश्वर ! आप नागराजको हार स्वरूप धारण करनेवाले हैं । हे त्रिलोचन (तीन नेत्रों वाले) आप भष्मसे अलंकृत, नित्य (अनादि एवं अनंत) एवं शुद्ध हैं । अम्बरको वस्त्र समान धारण करनेवाले दिगम्बर शिव, आपके न् अक्षरद्वारा जानेवाले स्वरूपको नमन है […]
अजन्मानो लोकाः किमवयववन्तोऽपि जगतां । अधिष्ठातारं किं भवविधिरनादृत्य भवति ।। अनीशो वा कुर्याद् भुवनजनने कः परिकरो । यतो मन्दास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे ।। अर्थ : हे प्रभु, आपके बिना ये सब लोक (सप्त लोक – भू: भुव: स्व: मह: जन: तप: सत्य) का निर्माण क्या सम्भव है ? इस जगतका कोई रचयिता न हो, ऐसा […]
लिंगाष्टकम
ब्रह्ममुरारिसुरार्चितलिङ्गम् निर्मलभासितशोभितलिङ्गम् ।
जन्मजदुःखविनाशकलिङ्गम् तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥१॥
अर्थ : उस सदाशिवलिंगको मैं प्रणाम करता हूं जो शाश्वत शिव है, जिनकी अर्चना स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और अन्य देवता ….
प्रातः स्मरामि भवभीतिहरं सुरेशं गङ्गाधरं वृषभवाहनमम्बिकेशम् । खट्वाङ्गशूलवरदाभयहस्तमीशं संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम् ॥१॥ अर्थ : जो सांसारिक भयको हरनेवाले और देवताओंके स्वामी हैं, जो गंगाजीको धारण करते हैं, जिनका वाहन वृषभ है, जो अम्बिकाके ईश हैं तथा जिनके हस्तमें खट्वाङ्ग, त्रिशूल और वरद तथा अभयमुद्रा है, उन संसार-रोगको हरनेके निमित अद्वितीय औषधिरूप ‘ईश’का (महादेवजी ), मैं प्रातःसमयमें स्मरण करता […]
नमस्ते रुद्रमन्यव उतोत इषवे नम: बाहुध्यामुत ते नम: । अर्थ : हे भगवान शिव आपके रौद्र स्वरूपको वन्दन है ! आपके बाणको वन्दन है, आपके धनुषको वंदन है और आपके सारे शस्त्रोंको वन्दन है !
सविन्दुसिन्धु-सुस्खलत्तरंगभंग-रंजितं , द्विषत्सुपापजात-जातकारि वारिसंयुतम् । कृतान्त-दूतकालभूत-भीतिहारि वर्मदे , त्वदीयपाद पंकजं नमामि देवि नर्मदे ।। १ ।। अपने जल बिन्दुओंसे सिन्धुकी उछलती हुई तरंगोंमें मनोहरता लानेवाले तथा शत्रुओंके भी पाप समूहके विरोधी और कालरूप यमदूतोके भयको हरनेवाले , अतएव सब भांति रक्षा करनेवाली-हे देवि नर्मदा ! तुमहारे जलयुत चरण कमलोंको मैं प्रणाम करता हूं ।।११ ।। […]