अन्याय करनेवालेसे अधिक बडा पापी अन्याय सहन करनेवाला होता है। अन्याय करनेवालेकी तो बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी होती है परंतु अन्याय सहन करनेवालेकी वृत्ति नपुंसक हो चुकी होती है और ऐसे प्रवृत्तिवाले शेरपर तो लोमडी भी राज्य करती है – तनुजा ठाकुर
मेरे कुछ मित्र कहते हैं कि बेरोजगारी दूर करनेके लिए हमारे साथ मिलकर कार्य कीजिये, तो कुछ कहते अशिक्षा दूर करने हेतु मेरे संग प्रयास कीजिये, कुछ कहते कन्या भ्रूण हत्या समाप्त करने हेतु हमारे संग जुडें, तो कुछ कहते हैं भ्रष्टाचार दूर करने हेतु हमारे साथ जुडें, परन्तु हमारे श्रीगुरुने इस सन्दर्भमें अत्यंत सुन्दर […]
मेरे कुछ हिन्दु मित्र कहते हैं कि आप हिन्दु धर्ममें होनेवाले अनाचार सार्वजनिक रूपसे न लिखें इससे हमें लज्जा अनुभव होती है और ऐसा करनेसे हमारा धर्म निर्बल हो जाएगा !! हिंदुओंको यदि सबल और सशक्त बनना है तो उसे अपने धर्म अंतर्गत होनेवाली धर्मग्लानिके कारणको स्वीकार करना ही होगा और तत्पश्चात ही उसमें सुधार […]
किसी भी समाजमें ५% (5%) दुर्जन , १० % (10%) साधक और ८५% (85%) सज्जन होते हैं, जब साधक संगठित होकर राज्य करते हैं तब राष्ट्रका सर्वांगीण विकास होता है और जब दुर्जन संगठित होकर राज्य करते हैं तो चारो ओर त्राहिमां और हाहाकार मच जाता है और जो ८५% जनता होती है , जो […]
हमारे इस धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र पर प्रतिवर्ष आनेवली भीषण प्राकृतिक आपदाएं – सूखा, बाढ, भूकम्प, भू-स्खलन, सूनामी इत्यादि यह संकेत करती है कि इस देशके राजा और प्रजा दोनोंके अधर्मी हो जानेके कारण प्रकृति हमें दंड दे रही है ! और इसका पर्याय एक ही है , वैदिक सनातन धर्म अधिष्ठित राष्ट्र प्रणालीकी स्थापना, जहां राजा […]
जब राजा धर्मनिष्ठ हुआ करते थे तब यदि राष्ट्र में वृष्टि नहीं होती थी तब संत के शरण जाकर उसका निवारण पूछते थे और इंद्रा को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ करते थे। आज के राजा modern हो गए हैं और धर्मनिरपेक्ष भी अतः अब वे वैज्ञानिक के पास जाते हैं और वे उन्हें कृत्रिम […]
आजके कालमें दुर्जन संगठित हैं और सज्जन नहीं, इस कारण सर्वत्र ‘त्राहि मां’ की स्थिति बनी हुई है। जब भी इस देशकी तथाकथित लोकतान्त्रिक व्यवस्था (स्वतन्त्रता पश्चात प्रजातन्त्रके नामपर एक प्रकारका राजतंत्र ही नेहरू कुलचला रहे हैं ) राजनीतिज्ञोंद्वारा किए जा रहे कृकृत्योंपर नियंत्रण करने हेतु कुछ भी प्रयास करना चाहती है सर्व पक्षीय नेतागण […]
हमारी धर्म निरपेक्ष व्यवस्था ( धर्मद्रोही कहना अधिक योग्य होगा ) में विद्यार्थियों को नियमित पाठ्यक्रम अंतर्गत यौन शिक्षा दी जाती परंतु वासना को नियंत्रित करने हेतु नैतिक मूल्य और साधना संबन्धित ज्ञान नहीं दिया जाता है ऐसे में इस देश चहुं ओर स्त्री के चरित्र का हनन हो तो आश्चर्य क्या ! जिस समाज […]
हमारी संस्कृतिमें जिस भी व्यवसाय या पुरुषद्वारा स्त्रीके नग्न देहका माध्यम बनाकर व्यापार किया जाता था या जीवकोपार्जन किया जाता था , उसे समाज अत्यधिक हेय दृष्टिसे देखता था क्योंकि ऐसा करना पुरुष एवं उस व्यवसायी के लिए लज्जास्पद था, परंतु आज पत्रकार, कलाकार (निर्देशक इत्यादि), चित्रकार, शिल्पकार और न जाने कितने ‘कार’ सभी स्त्रीकी […]
जब वर्ष १९९८ में मुझे ज्ञात हुआ था अनेक संतोंने लिखा और कहा है कि वर्ष २०१२ से २०२० के मध्य विश्वकी ३० से ४०% और भारतकी ५०% जनसंख्या नष्ट हो जाएगी इतना विनाशकारी काल आनेवाला है तो मुझे लगता था कि मैं क्या करूंं कि इस जनहानिको किसी न किसी रूपमें टाल पाऊंं परंतु […]