भारत जैसे उष्ण प्रदेशमें जहां वैसे ही लोगोंमें अम्लता अधिक होती है, इसका सेवन करनेसे अधिक अम्लताके कारण छाती और उदरमें अर्थात पेटमें जलन होती है; इसलिए हमारे देशमें जहां अनेक दिव्य एवं देशी पौष्टिक पेय उपलब्ध हैं, वहां चाय एक अनावश्यक, तमोगुणी एवं हानिकारक पेय है । वैसे भी हमारी संस्कृतिमें हम सदैव सात्त्विक आहार एवं पेयका ही सेवन करते आए हैं और चाय मूलतः तमोगुणी होनेके कारण यह हमारी संस्कृतिकी अंग कभी भी नहीं रही है ।
चायके लाभ न्यून और हानियां अधिक हैं; अतः इस तमोगुणी पेयके स्थानपर अन्य भारतीय पेय पीएं और पिलाएं । शिशिर ऋतुमें अर्थात सर्दियोंमें चायके स्थानपर अर्जुनकी छालका काढा पी सकते हैं, जो चायके विपरीत और गुणकारी लाभ देता है एवं ग्रीष्म ऋतुमें ठंडाई, नारियल पानी, छाछ, मट्ठा, लस्सी, निम्बू पानी, खस या सौंफसे बनाए हुए पेय पदार्थोंका प्रयोग कर सकते हैं ।
अब यदि चाय पीना ही हो तो उसे निम्नलिखित पद्धतिसे बनाकर पीनेका प्रयास करें –
१. चायकी पत्तियोंको उबलते जलमें डालकर, आंचसे उतारकर, उसे दो मिनिट ढक दें और तब उसे छानकर पीएं । चायकी पत्तियोंको अधिक समयतक कभी न उबालें; क्योंकि इससे ‘टैनिन’की मात्रामें वृद्धि होती है ।
२. चायमें चीनीके स्थानपर गुडका उपयोग करें !
३. गुडवाली चायमें दूध न डालकर नींबू डालें !
४. यद्यपि चाय पीनेसे अम्लता बढती है; अतः इसे पीनेसे पूर्व एक गिलास शीतल जल अवश्य पीएं !
५. सम्भव हो तो हरी पत्तियोंवाली चाय पीएं, यह रोग प्रतिरोधक तत्त्व युक्त होती है एवं प्रचलित चूरेवाली चायसे अधिक लाभकारी होती है ।
यूरोपीय चायमें चीनी और दूध तो डालते ही नहीं हैं और वे हरी पत्तियोंवाली चाय पीते हैं, जो उनकी जलवायु एवं प्रकृति अनुरूप होती है; अतः अपने विवेकका उपयोगकर ऋतु, जलवायु एवं अपनी शारीरिक प्रकृति अनुरूप योग्य पेय लें और स्वस्थ रहें !
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