चातुर्मासमें त्यौहार एवं व्रतोंकी अधिकताका कारण


आषाढ शुक्ल एकादशीसे कार्तिक शुक्ल एकादशीतक, चौमासेमें पृथ्वीपर प्रवाहित तरंगोंमें तमोगुणप्रबल तरंगोंकी मात्रा अधिक रहती है । उनका सामना कर पानेके लिए सात्त्विकता बढाना आवश्यक है । त्यौ
हार एवं व्रतोंद्वारा सात्त्विकतामें वृद्धि होती है । चातुर्मासमें अधिकाधिक त्यौहार एवं व्रत आते हैं ।

व्रत शब्दकी व्युत्पत्ति एवं अर्थ

‘व्रत’ शब्द ‘वृ’ धातुसे बना है । इसके विभिन्न अर्थ हैं । वरना अर्थात स्वीकारना, संकल्प, इच्छा, आज्ञापालन, उपासना, प्रतिज्ञा इत्यादि । श्रद्धालुओंकी यह धारणा होती है कि ‘देवताओंने उनके एवं प्राणियोंके लिए कुछ विशिष्ट आज्ञाएं की हैं । ऐसी आज्ञाओं अथवा कर्तव्योंका जब दीर्घकालतक पालन किया जाता है, तो उन्हें रूढि अथवा प्रथाका स्वरूप प्राप्त होता है । जब लोगोंमें श्रद्धा जागृत होती है, कि देवताओंद्वारा संकल्पित विशेष कृत्य करना अनिवार्य है, तब उन्हें धार्मिक आचार अथवा उपासनाका अर्थ ज्ञात होता है । विशिष्ट कालके लिए अथवा आमरण आचरणमें लाने हेतु विशिष्ट नित्यनेमको व्रत कहते हैं । भगवानकी कृपाप्राप्ति हेतु जब कोई व्यक्ति अपने आचार अथवा अन्नादि व्यवहार प्रतिबंधित करता है, तब उन निर्बंधोंको पवित्र प्रतिज्ञा अथवा धार्मिक कर्तव्यका स्वरूप प्राप्त होता है । इसके द्वारा आज्ञापालन, धार्मिक कर्तव्य, देवताओंकी उपासना, नैतिक आचरण, विधियुक्त प्रतिज्ञा, अंगीकृत कार्य जैसे विविध अर्थ ‘व्रत’ शब्दके साथ जुड जाते हैं ।

व्रतकी परिकल्पना एवं इतिहास

मनुष्यकी रचना करनेसे पूर्व ईश्वरने मनुष्यके लिए आचारसंहिता बनाई । परंतु आगे चलकर कालके प्रवाहमें मनुष्यके धर्माचरणमें दिनोंदिन न्यूनताएं आती गर्इं तथा वहींसे व्रतोंकी परिकल्पना हुई । प्राचीन समयसे व्रत एक दिव्य साधनके रूपमें प्रसिद्ध हैं । व्रत अनेक हैं एवं व्रतोंके प्रकार भी अनेक हैं । यदि व्रतसंख्याका विचार करें, तो विभिन्न ग्रंथोंके अनुसार व्रतोंकी संख्या भिन्न है ।

इ.स. १९२९ में महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराजद्वारा प्रसिद्ध व्रतकोशमें १६२२ व्रतोंकी सूची दी गई है । व्रतराज, व्रतार्क, व्रतकौस्तुभ, हेमाद्रिव्रत इत्यादि ग्रंथोंमें व्रतसंबंधी विस्तृत जानकारी दी गई है । भारतभरमें एकादशीव्रत अर्थात पंढरपुर एवं आळंदीकी यात्रा करनेके दो व्रत प्रसिद्ध हैं । साथही वटसावित्रीव्रत, महालक्ष्मी व्रत, अन्नपूर्णा व्रत, कजलीतृतीया अर्थात हरितालिका इत्यादि व्रत भी अधिकतर किए जाते हैं ।

व्रतोंका महत्त्व

सामान्यजनोंके लिए वेदानुसार आचरण करना अत्यंत कठिन है । इस कठिनाईको दूर करने हेतु पुराणोंमें ऐसे व्रतवैकल्य बताए गए हैं, जिन्हें आचरणमें लाना सभीके लिए सुलभ होता है तथा उनसे सभीका उद्धार होता है । व्रतोंका महत्त्व विविध बातोंसे स्पष्ट होता है ।

व्रत सत्त्वगुणमें वृद्धि लाते हैं

व्रत मनुष्यको इंद्रियनिग्रही, मनःसंयमी, मितआहारी, मितभाषी एवं सहिष्णु बनाते हैं । इससे मनुष्यका सत्त्वगुण बढता है । महाराष्ट्रके संत समर्थ रामदास स्वामीजीने ‘श्री दासबोध’ नामक ग्रंथमें कहा है, कार्तिकस्नान, माघस्नान, व्रत उद्यापन, दान, निष्काम भावसे की गई तीर्थयात्रा, उपोषण, ये सर्व सत्त्वगुणमें वृद्धि लाते हैं ।

व्रतं भाग्यम अर्थात व्रत भाग्यवृद्धि करते हैं

भाग्यके कारण मनुष्यका सर्व दृष्टिसे उत्कर्ष होता है । इससे दुःख एवं आपत्तिका नाश होता है तथा संपत्ति, कीर्ति, यश, आयुआरोग्य इत्यादिका लाभ होता है । सती सावित्रीने व्रतके माध्यमसे अपना भाग्योदय करवा लिया । सावित्रीके भाग्यसे उनके श्वसुरको दृष्टि, राज्य एवं धर्मबुद्धि प्राप्त हुई । उनके पिताको पुत्रप्राप्ति हुई, उनके पति सत्यवानको जीवन प्राप्त हुआ तथा उन्हें स्वयं पुत्रप्राप्ति हुई ।

व्रतं पुण्यम अर्थात व्रतसे पुण्य होता है

पुण्य एक अलौकिक संपत्ति है । मनुष्य जीवनमें पुण्यका महत्त्व एवं आवश्यकता अनन्य है । पुण्यसेही मनुष्यको इच्छित फल, यश, कीर्ति, समाधान आदि प्राप्त होते हैं । यह सर्व व्रत करनेसे साध्य होता है ।

व्रतं यज्ञः अर्थात व्रत एक यज्ञ है

‘यज्ञात् भवति पर्जन्यः । ’ ऐसा वचन है । ‘व्रत’ एक यज्ञ है, इसलिए इससे पर्जन्य, विश्वशांति जैसे लाभ होते हैं । अधिकतर यज्ञविधिका फल है स्वर्गप्राप्ति, जो मृत्युपश्चात प्राप्त होता है । व्रतोंके संदर्भमें ऐसा नहीं है । व्रतोंके फल व्रतकर्ताको इसी जन्ममें मिलते हैं । वैदिक यज्ञ कुछ ही लोग कर पाते है; परंतु व्रत कोई भी कर सकता है । ऐतरेय ब्राह्मणग्रंथमें बताया गया है कि जिसने व्रतको अंगीकार न किया हो, उसके द्वारा अर्पित आहुतिको देवता नहीं स्वीकारते । इस दृष्टिसे यज्ञकी तुलनामें व्रत श्रेष्ठ है ।

व्रतं तपः अर्थात व्रत एक प्रकारका तप है

तपका सामर्थ्य अधिक है । तपसे असाध्य भी साध्य हो जाता है । व्रतसे तपके सर्व लाभ मिलते हैं । इस दृष्टिसे व्रत एक श्रेष्ठ कोटिका तप है, ऐसा जाबालोपनिषद्दर्शनमें बताया गया है ।

व्रतं देवेशपूजनम अर्थात व्रत एक देवतापूजन है

व्रत करनेसे देवता प्रसन्न होते हैं । देवता प्रसन्न होनेसे मनुष्यका जीवन सफल होता है । जीवनकी सफलता ही व्रतका परम फल है ।
courtesy : www.hindujagruti.org/hindi



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