जनवरी ११, २०१९
पश्चिम बंगालके प्रेसीडेंसी महाविद्यालयमें स्वामी विवेकानन्दजीकी जयंतीकी पूर्व संध्यापर आयोजित कार्यक्रममें वामपंथी गुण्डोंने आक्रमण कर दिया । बता दें कि विवेकानंदजीकी जयंती १२ जनवरीको है; परन्तु यह कार्यक्रम एक दिवस पूर्व आयोजित किया गया था; क्योंकि स्वामीजीके जन्मदिवसपर महविद्यालय बंद रहता है ।
आयोजित कार्यक्रममें हिंदूत्वके महान प्रचारकको श्रध्दाञ्जलि देनेके अतिरिक्त गरीब बच्चोंमें भोजन तथा वस्त्र वितरित किए गए । सूत्रोंकी मानें तो इस आयोजनके लिए महाविद्यालयके कुलपतिसे अनुमति ली गई थी, जिसे सम्बोधित करनेके लिए आमन्त्रित तीन प्राध्यापकोंको वामपन्थी गुंडोंने उद्विग्न किया । विरोध करनेपर इन छात्रोंने हंगामाकर वहांसे लोगोंको भगा भी दिया । इतना ही नहीं इन गुंडोंने कार्यक्रम आयोजित करने वाले छात्रोंको भी प्राणोंकी चेतावनी दी ।
‘सिटी कॉलेज ऑफ कॉमर्स एण्ड बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन’के प्राध्यापक आदित्य दासने बताया, “जैसे ही अपना भाषण आरम्भ किया, तुरन्त ही एक बडी भीड एकत्र हो गई। उन्होंने हंगामा आरम्भ कर दिया और जो निर्धन लोग भोजन एवं वस्त्र लेने आए थे, उन्हें भगा दिया और कुर्सियां तोड दी गईं !”
दासने आगे बताया कि मंचपर एक महिला और मुस्लिम प्राध्यापक भी थे। जो मुस्लिम प्राध्यापक हैं, वह बांग्ला विभागके विभागाध्यक्ष हैं । उनपर भी उन गुंडोंने आक्रमण किया । उन्होंने महिला प्राध्यापकको भी बोलनेका अवसर नहीं दिया !
एक प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानमें जो कुछ भी हुआ, उससे सभी बहुत निराश थे । उन्होंने बताया, “प्रेसीडेंसी, जो भारत ही नहीं, अपितु पूरे विश्वमें विख्यात है; परन्तु हमें आज इसप्रकारके घृणित आचरणका साक्ष्य बनना पडा । हम इस महाविद्यालयमें अध्यापनका कार्य नहीं करते हैं और ना ही हमने यहां अध्ययन किया; परन्तु अपने पुराने अनुभवोंके आधारपर हम निश्चित रूपसे कह सकते हैं कि यह परिस्थितियां अत्यंत भयानक हैं।”
सूत्रोंने बताया कि स्वामीजीको श्रध्दाञ्जलि देनेके पश्चात निर्धन बालकोंको भोजन कराया गया । यह हंगामा तब आरम्भ हुआ, जब प्राध्यापक चौधरीने देहलीके जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय और कोलकाताके जादवपुर विश्वविद्यालयमें बढती राष्ट्रविरोधी विचारधारापर बात करनी आरभ की । उन्होंने जेएनयूमें स्वामी विवेकानंदजीकी प्रतिमा लगाए जानेका विरोध और ‘भारत तेरे टुकडे होंगे’ जैसे नारोंपर भी असंतोष प्रकट किया ।
“रामकृष्ण परमहंसके परम शिष्य स्वामी विवेकानन्द, क्रान्ति व धर्मकी ज्योति जगाने हेतु जिनका नाम ही पर्याप्त है, उन सन्तकी धरापर अब उनके प्रकाट्य उत्सवपर भी बंगालमें विरोध हो रहा है, इससे अधिक दुःखकी बात कोई होगी क्या ? और इसमें कुछ अनुचित नहीं कि यह सब वहांके निधर्मी शासकोंके मुस्लिम तुष्टिकरण और हिन्दुओंके सुप्त रहनेके कारण ही हुआ है और इस स्थितिको सुधारने हेतु हिन्दू राष्ट्रकी ही आवश्यकता है, जहां सन्तोंका अपमान करनेवाले किसी निधर्मीका कोई स्थान नहीं होगा !”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : ईपोस्टमार्टेम
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