इस्लामिक ‘टेरर’की भयावहता, घुटनोंपर रेंगने लगे बडे ‘मीडिया’ घराने, मुसलमानोंको ठेस पहुंंचानेवाली ‘कंटेंट’पर स्वयं ही चला रहे ‘कैंची’


०९ जून, २०२२
      नूपुर शर्माकी टिप्पणीपर मुसलमान समुदायद्वारा व्यक्त आक्रोश, जिसकी अगली कडीके रूपमें मस्तक काटने और सामूहिक दुष्कर्मकी धमकीने अब पूरा भानुमतीका पिटारा ही खोल दिया है । वास्तवमें, जबसे प्रधानमन्त्री मोदी सत्तामें आए, हिन्दुओंने ‘ओवरटन विंडो’को (नैरेटिवको) अपने अनुसार व्यापक रूपसे निर्धारित करनेमें सफलता प्राप्त की है, जिसमें कई वर्जित विषयोंमें खुलकर बात की गई है, चाहे वह हिन्दू नरसंहार हो, इस्लामी आक्रमण, इतिहासकी विकृति या सांस्कृतिक ‘विरासतों’का सुधार । अन्य दृष्टिकोणसे देखा जाए तो नसीम तालेबका सिद्धान्त पूर्णतः जीवन्त हो चुका है कि कैसे सबसे असहिष्णु जीतता है ?, इसीका परिणाम है कि आज इस्लामकी आलोचना मुख्यधारासे पहले ही ‘पब्लिक डिस्कोर्स’का अंग बन चुकी है ।
        ‘तालिबान’ और ‘अल कायदा’ सहित इस्लामी समुदायके एक स्वरमें ‘गुस्ताख-ए-रसूल’की एक सजा, सर तनसे जुदा’के उद्घोष लगानेके पश्चात, ‘मीडिया’ घराने भी भयभीत हुए हैं । उनको ऐसा लगता है कि उन साक्षात्कारोंको न दिखाएंं जो मुसलमानों और इस्लामवादियोंको रुष्ट कर सकते हैं ।
         किसी भी राष्ट्र और समाजका बाहुबल उसके बौद्धिक बलकी चेतनाके अधीन होना चाहिए, बौद्धिक बलको सदा आत्मबलसे ओतप्रोत होना चाहिए, परमात्म तत्त्वके अधीन होना चाहिए; अन्यथा अनियन्त्रित बाहुबल और दिशाहीन बौद्धिक शक्तिके होनेसे अनेक देश व समाज धरातलको पतित होते आ रहे हैं; अतः दैवी हिन्दू राष्ट्रकी धरातलमें स्थापनासे ही असामाजिक व आतङ्की तत्त्वोंंको पूर्ण रूपसे विघटित करना होगा तथा धरामें दैहिक, दैविक एवं भौतिक स्तरोंपर शान्ति स्थापित करना अत्यधिक सहज है । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
 
 
स्रोत : ऑप इंडिया


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