दण्डका विधान पापकर्मोंके फलको न्यून करता है !
दण्डका विधान हमारे पापकर्मोंसे निर्माण हुए कर्मफलको करता है न्यून, इस सरलसे तथ्यका भी ज्ञान नहीं है आजके भ्रष्टाचारी नेताओंको | दण्डका विधान, पापकी तीव्रताको नष्ट करने हेतु या न्यून करने हेतु दिया जाता है । जो भी शासक या प्रशासक, सार्वजनिक कार्य या राष्ट्रके कार्य करते समय हुई अपनी चूकोंको (अपराधोंको) स्वीकार नहीं करता है, उसे न्यायालय दण्ड देता है। ऐसेमें उस दण्डको भोगनेसे, उसकेद्वारा किए गए पापकर्मसे कर्मफलकी तीव्रता न्यून हो जाती है और उसे अपने पापोंका कर्मफल अपेक्षाकृत अल्प कष्ट भोगना पडता है । अहंकार एवं धर्मकी शिक्षा न होनेके कारण आजके राजनेताओंको यह सरल-सा सिद्धान्त ज्ञात नहीं होता; इसलिए कारागारके स्थानपर वे अपने रोगका बहाना बनाकर चिकित्सालयमें प्रविष्ट (भर्ती) हो जाते हैं ! ऐसे बहिर्मुख नेताओंको न यहांके विधानसे भय लगता है (अन्यथा वे भ्रष्टाचार नहीं करते) और न ही ईश्वरके दण्डसे भय लगता है । पूर्वकालके राजाओंके द्वारा यदि आखेटके (शिकारके) समय भी कोई पाप हो जाए और किसीने नहीं देखा हो, तो भी वे अपने राज्यका उत्तरदायित्व छोडकर प्रायश्चित्त करने वनमें निकल जाते थे और आजके राज्यकर्ता अपने पापोंको साक्ष्यके साथ सिद्ध होनेपर भी उसे स्वीकार नहीं करते हैं ! सात्त्विक और तामसिक राज्यकर्ताओंमें यही भेद है । हिन्दू राष्ट्रमें ऐसे बहिर्मुख एवं तमोगुणी राज्यकर्ता नहीं होंगे !
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