धर्म शिक्षणके अभावमें आजका हिन्दू व्रत-त्योहार भी सात्त्विक रीतिसे नहीं मनाता है, दीपावली सम्पूर्ण भारतमें पूरे हर्षोल्लासके साथ मनाया जानेवाला सामान्य जनमानसका त्योहार है; अतः अगले कुछ दिवस हम इसे सात्त्विक रीतिसे कैसे मना सकते हैं, इसके विषयमें प्रतिदिन कुछ न कुछ जानेंगे ।
अनेक हिन्दू आजकल दीपावलीमें दीपके स्थानपर मोमबत्ती जलाते हैं । मोमबत्ती तमोगुणी होती हैं; अतः मोमबत्तीके स्थानपर महालक्ष्मीके तत्त्वको आकृष्ट करने हेतु एवं सुख समृद्धिमें वृद्धि हेतु तेलके मिट्टीके दिए जलाएं ।
ऐसा बताया जाता है कि मोमबत्तीका पहली बार निर्माण और उपयोग चीनमें हुआ । तब इसका निर्माण व्हेल मछलीके वसासे (चर्बीसे) किया जाता था । उसके पश्चात यूरोपमें प्राकृतिक वसा और मोमसे इसका निर्माण किया जाने लगा और अब कंपनियां पैराफिन मोमसे मोमबत्तियां बनाती हैं । ये सभी पदार्थ तमोगुणी होनेके कारण मोमबत्तीसे निकलनेवाला प्रकाश तमोगुणी होता है । आजकल रंग-बिरंगे, भिन्न आकृतियोंमें एवं भिन्न सुगन्धोंमें आनेवाला मोमबत्ती मायावी आसुरी शक्तियोंके कष्टको सहज ही आकृष्ट करती हैं; अतः मोमबत्तीका प्रयोग मात्र दीपावलीमें ही नहीं अपितु सामान्य दिनोंमें भी करना टालें ।
तमोगुणी होनेके कारण हमारी भारतीय संस्कृतिमें मोमबत्तीका प्रयोग लगभग निषेध ही रहा है । दीपावली शब्दका अर्थ है दीपोंकी अवलि अर्थात पंक्ति । यदि दीपावलीमें मोमबत्तीका प्रचलन होता तो इसका एक नाम मोमबत्तीवली भी होता ! सत्त्वगुणी वैदिक आर्य सदैवसे ही प्रकाश हेतु घी या तेलवाले दीपोंका उपयोग करते आ रहे हैं; अतः इस दीपावलीमें अपने घरमें सात्त्विक मिट्टीके दीयोंकी पंक्ति सजाकर देवताके तत्त्वको आकृष्ट करें । ध्यान रखें, तमोगुणी मोमबत्ती आसुरी शक्तियोंको आकृष्ट करती हैं एवं हमारे घरके वास्तुमें तमोगुणी लहरियोंका वास्तव्य होनेसे वर्ष भर कलह-क्लेश, रोग-शोक, आर्थिक-हानि इत्यादि होती हैं ।
जो लोग विदेशमें रहते हैं और यदि उन्हें वहां मिट्टीके दीपक नहीं मिलते हैं तो वे मात्र पांच दीपक जला सकते हैं, वे ये दीपक अपने घरपर भी बना सकते हैं या ऑनलाइन क्रय कर सकते हैं, मात्र आपमें धर्म पालन एवं त्योहारको सात्त्विक रीतिसे मनानेकी उत्कंठा होनी चाहिए । ऐसे लोग जब भारत आते हैं तो वे यहांसे पीतलके पांच या ग्यारह दीप ले कर जा सकते हैं । यदि आप पांच दीपक ही लगा रहे हैं तो एक अपने देवघरमें, एक तुलसीकी पिण्डीपर, एक द्वारपर, एक घरके पिछवाडे एवं एक घरके मध्य स्थापर लगाएं । देवघर और तुलसी स्थानपर घीका दीप जलाएं, यदि वह उपलब्ध न हो या उसे लेनेकी आर्थिक क्षमता न हो तो तिलके तेलका उपयोग कर सकते हैं, शेष दीयों हेतु पारम्परिक तेल (मिट्टीके तेल व रिफाइंड तेलको छोडकर) अर्थात कोई भी खानेवाले तेलका उपयोग कर सकते हैं । मिट्टीका तेल तमोगुणी होता है व रिफाइंड तेलमें रासायनका उपयोग करनेके कारण वह सत्त्वगुण रहित होता है; अतः इनका उपयोग न करें, मैंने कई गांवोंमें मिट्टीके तेलका उपयोग करते हुए लोगोंको देखा है, अतः आपको बता रही हूं ।
(दीपावलीके विषयमें और जानकारी हेतु धर्मधारा श्रव्य सत्संग भी अवश्य सुनें)
– तनुजा ठाकुर (१०.१०.२०१७) (क्रमश:)
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