आनंदका स्रोत हमारे बाहर नहीं, अंदर है !!!


कुछ धनाढ्य साधक भ्रमणका आनंद लेने हेतु विदेश जाते हैं, ऐसे साधकोंको सूचित कर दूं कि यदि इसके स्थानपर आप भारतमें ही किसी धार्मिक स्थलपर जाएंगे तो वह अधिक उपयुक्त होगा, इसके कारण निम्न हैं –

१. विदेशमें अधिकांश नहीं वरन् १०० % होटल ‘भूतहा’ होते हैं, योग्य गुरुकी शरणमें साधना करनेसे आपका सूक्ष्म आवरण जो आपकी साधना एवं गुरुकृपाके कारण कवच समान हो जाता है, उससे सूक्ष्म जगतकी आसुरी शक्तियोंको यह ज्ञात हो जाता है कि आपको कष्ट देनेसे उन्हें सद्गति मिल सकती है; अतः वे आपके कष्टको बढा देती हैं ।

२. विदेशमें सात्त्विक आहारका मिलना असंभव है, वहांके फल भी वर्णसंकरके कारण सात्त्विक नहीं होते हैं, वर्णसंकरके कारण उसके मूल स्वरुपको समाप्त कर दिया जाता है, तो पके हुए भोजनकी बात ही क्या है ?

३. विदेशमें संतोंका प्रमाण अत्यल्प है एवं वहांके निवासी भी अधिकतर तमोगुणी और रजोगुणी होते हैं, ऐसेमें उनके संपर्कमें रहनेसे हमारे मन एवं बुद्धिका काला आवरण बढ जाता है ।

अतः जहां तक सम्भव हो विदेश जाना टालें ! आनंदका स्रोत हमारे बाहर नहीं, अंदर है, आपके पास समय हो तो भारतमें ही तीर्थक्षेत्र या किसी प्राकृतिक सुरम्य स्थलपर जाएं या आश्रममें रहकर सेवा करें !  -तनुजा ठाकुर



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